iimt haldwani

एग्रीकल्चर- किसानों के लिए मोदी सरकार की खास स्कीम PKVY- प्रति हेक्टेयर मिलेंगे 50 हजार रुपये ! जानें इसके बारे में सबकुछ

134

एग्रीकल्चर (Agriculture) PKVY – भारत में जैविक खेती की परंपरा और महत्व आरम्भ से ही रही है। पूर्ण रूप से जैविक खादों पर आधारित फसल पैदा करना जैविक खेती कहलाता है। दुनिया के लिए भले ही यह नई तकनीक हो, लेकिन देश में परंपरागत रूप से जैविक खाद पर आधारित खेती होती आई है। जैविक खाद का इस्तेमाल करना देश में परंपरागत रूप से होता रहा है। अगर आप भी परम्परागत कृषि विकास योजना PKVY योजना का लाभ उठाना चाहते है तो ये योजना है आपके लिए महत्वूपर्ण है। जिसके चलते केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 5 जुलाई के अपने पहले फुल बजट में ‘जीरो बजट’ खेती का एलान किया। रासायनिक खाद उपभोग के मामले में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है।

drishti haldwani

kisan3

जीरो बजट खेती के तहत जरूरी बीज, खाद-पानी आदि का इंतजाम प्राकृतिक रूप से ही किया जाता है। इसके लिए मेहनत जरूर अधिक लगती है, लेकिन खेती की लागत बहुत कम आती है और मुनाफा ज्यादा मिलता है। दूसरी ओर, 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से कैमिकल और पेस्टिसाइड का कम इस्तेमाल करने की सलाह दी। उन्होंने 14.5 करोड़ किसानों से कहा कि एक किसान के रूप में हमें धरती मां को बीमार बनाने का हक नहीं है। दरअसल, उनका इशारा प्राकृतिक यानी आर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देने पर था। इसीलिए आज हम आपको केंद्र सरकार की खास योजना के बारे में जानकारी दे रहे हैं। जिससे आपको प्राकृतिक खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये मिलेंगे।

परम्परागत कृषि विकास योजना PKVY

पिछले कुछ वर्षों में रसायनिक खादों पर निर्भरता बढऩे के बाद से जैविक खाद का इस्तेमाल नगण्य हो गया है।आज के समय में बढ़ते हुए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग को देखते हुए जैविक खेती भारत में और भी महत्वपूर्ण बन गया है। दुनिया भर में जैविक खाद्य के लिए मांग में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। इन जैविक खेती की तकनीक को बढ़ावा मिलने से भारत इन खाद्य पदार्थों के विशाल निर्यात की संभावनाओं को साकार कर सकता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने परम्परागत कृषि विकास योजना PKVY को शुरू किया है।

kishan

  • केंद्र सरकार ने जैविक खेती प्रमोट करने के लिए सरकार ने परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) बनाई है। पीकेवीवाई के तहत तीन साल के लिए प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये की सहायता दी जा रही है।
  • इसमें से किसानों को जैविक खाद, जैविक कीटनाशकों और वर्मी कंपोस्ट आदि खरीदने के लिए 31,000 रुपये (61 प्रतिशत) मिलता है।
  • मिशन आर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ इस्टर्न रीजन के तहत किसानों को जैविक इनपुट खरीदने के लिए तीन साल में प्रति हेक्टेयर 7500 रुपये की मदद दी जा रही है।
  • स्वायल हेल्थ मैनेजमेंट के तहत निजी एजेंसियों को नाबार्ड के जरिए प्रति यूनिट 63 लाख रुपये लागत सीमा पर 33 फीसदी आर्थिक मदद मिल रही है।
  • ऐसी खेती में कीटनाशक और रासायनिक खादों का इस्तेमाल नहीं होता।
  • आखिर सरकार की इस अपील के पीछे क्या मकसद है। क्या रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से धरती की उर्वरा शक्ति कम हो रही है या फिर लोगों के खराब होते स्वास्थ्य ने चिंता बढ़ा दी है?

kisan5

जैविक खेती का बढ़ता दायरा

जैविक उत्पादन हमारी सेहत के लिए सबसे कारगर हैं। जैविक उत्पाद खाने से तमाम बीमारियाँ दूर रहती हैं और शरीर स्वस्थ रहता है। खेती की लागत कम आती है और उत्पादन भरपूर मिलता है। यही वजह है कि सरकार की ओर से कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए जैविक खेती को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। भारत में जैविक खेती की तरफ ध्यान 2004-05 में गया, जब जैविक खेती पर राष्ट्रीय परियोजना (एनपीओएफ) की शुरूआत की गई। नेशनल सेंटर ऑफ आर्गेनिक फार्मिंग के मुताबिक 2003-04 में भारत में जैविक खेती सिर्फ 76,000 हेक्टेयर में हो रही थी जो 2009-10 में बढक़र 10,85,648 हेक्टेयर हो गई। उधर, केंद्रीय कृषि मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस समय करीब 27.70 लाख हेक्टेयर में जैविक खेती हो रही है। इनमें मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, यूपी और राजस्थान सबसे आगे हैं।

आर्गेनिक फार्मिंग और उसका बाजार

  • इंटरनेशनल कंपीटेंस सेंटर फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर के मुताबिक भारत में जैविक उत्पादों का बाजार 2020 तक 1.50 बिलियन अमेरिकी डॉलर का आंकड़ा हासिल कर लेगा।
  • केंद्रीय आयात निर्यात नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक भारत ने 2017-18 में लगभग 1.70 मिलियन मीट्रिक टन प्रमाणिक जैविक उत्पाद पैदा किया।
  • 2017-18 में हमने 4.58 लाख मीट्रिक आर्गेनिक उत्पाद एक्सपोर्ट किए. इससे देश को 3453.48 करोड़ रुपये मिले।
  • भारत से जैविक उत्पादों के मुख्य आयातक अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा, स्विट्जरलैंड, आस्ट्रेलिया, इजरायल, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, न्यूजीलैंड और जापान हैं।

kishan4

कैसे मिलता है जैविक खेती का सर्टिफिकेट

जैविक खेती प्रमाण पत्र लेने की एक प्रक्रिया है। इसके लिए आवेदन करना होता है। फीस देनी होती है। प्रमाण पत्र लेने से पहले मिट्टी, खाद, बीज, बोआई, सिंचाई, कीटनाशक, कटाई, पैकिंग और भंडारण सहित हर कदम पर जैविक सामग्री जरूरी है। यह साबित करने के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री का रिकॉर्ड रखना होता है। इस रिकॉर्ड के प्रमाणिकता की जांच होती है। उसके बाद ही खेत व उपज को जैविक होने का सर्टिफिकेट मिलता है। इसे हासिल करने के बाद ही किसी उत्पाद को ‘जैविक उत्पाद’ की औपचारिक घोषणा के साथ बेचा जा सकता है। एपिडा ने आर्गेनिक फूड की सैंपलिंग और एनालिसिस के लिए एपिडा ने 19 एजेंसियों को मान्यता दी है।

योजनाओं का मूल्यांकन और लाभ का दावा

केंद्र सरकार ने आर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही अपनी योजनाओं के लाभ का मूल्यांकन करने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल एक्टेंशन मैनेजमेंट से एक अध्ययन करवाया है। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक, इसके सकारात्मक परिणाम हैं। उत्पादन लागत में 10 से 20 तक तत्काल कमी आती है। लागत में कमी के कारण आमदनी में 20-50 फीसदी तक वृद्धि होती है। जनजातीय, वर्षा सिंचित, पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों में जैविक क्षेत्र में वृद्धि की बहुत गुंजाइश है। इस रिर्पोट का जिक्र लोकसभा में एक सांसद के सवाल के जवाब में किया गया है।

किसानों की चिंता और सरकारी तंत्र के दावे

सरकार आर्गेनिक खेती करने की अपील भले ही कर रही हो लेकिन किसानों को यह डर है कि अगर हम रासायनिक खादों का इस्तेमाल बंद कर देंगे तो प्रोडक्शन घट जाएगा। यह चिंता कुछ कृषि वैज्ञानिकों की भी है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) ने भारत व चीन में किए गए अध्ययनों के आधार पर इस बात की पुष्टि की है कि जैविक खेती अपनाने से किसानों की आय में काफी बढ़ोत्तरी होती है। प्रमाणिक जैविक उत्पाद का बाजार में अच्छा दाम प्राप्त किया जा सकता है। नेशनल सेंटर ऑफ आर्गेनिक फार्मिंग ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का दावा किया है।

krishi-vik

जैविक खेती से जुड़ी चुनौतियां

एग्रीकल्चर (Agriculture) इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर साकेत कुशवाहा कहते हैं कि भारत जैसे देश जहां पर 130 करोड़ लोग रहते हैं वहां ऑर्गेनिक खेती किसी चुनौती से कम नहीं है। क्योंकि ऐसी खेती में उत्पादन घटने की बड़ी संभावना रहती है। ऐसे में खाद्यान्न की जरूरत कैसे पूरी होगी, जबकि हमारी जोत घटती जा रही है. दूसरी चुनौती यह है कि जैविक खेती का बाजार क्या गांवों में मिलेगा? क्या जैविक उत्पादों को गांवों से शहरों तक लाने का कोई इंतजाम है?

kisan44

कुशवाहा के मुताबिक जैविक उत्पाद दो से तीन गुना महंगे होते हैं, इसलिए इसे उन्हीं जगहों पर बेचा जा सकता है जहां की परचेज पावर अच्छी है। हालांकि सच्चाई यह भी है कि जैविक उत्पाद के इस्तेमाल से मेडिकल पर खर्च कम हो जाएगा। किसान के लिए चुनौती यह है कि वो इतनी जैविक खाद कहां से बनाएगा। कुशवाहा के मुताबिक सरकार यह कर सकती है कि हर किसान को 25 फीसदी खेती पारंपरिक तरीके से करने के लिए प्रोत्साहित करे। जब किसानों को इससे फायदा मिलने लगेगा तो वो खुद धीरे-धीरे ऐसी खेती बढ़ाने लगेंगे।  आज भी कुछ किसान अपने लिए बिना खाद वाला प्रोडक्ट तैयार करते हैं।

रासायनिक खाद और बंजर होती धरती !

  • सीएसई (सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट) की स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2017 रिपोर्ट के मुताबिक, देश की करीब 30 प्रतिशत जमीन खराब या बंजर होने की कगार पर है. यह कृषि के लिए मूलभूत खतरा है. राजस्थान, दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, झारखंड, नागालैंड, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश में 40 से 70 प्रतिशत जमीन बंजर बनने वाली है।
  • दरअसल, देश को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए यूरिया का इस्तेमाल हरित क्रांति (1965-66) के बाद शुरू हुआ. लेकिन कृषि क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जिस यूरिया को हम उत्पादन बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं वह धीरे-धीरे हमारे खेतों को बंजर बना रही है।

kisan55

  • इसके खतरे को समझने के लिए भारत ने नाइट्रोजन के आकलन के लिए साल 2004 में सोसायटी फॉर कन्जरवेशन ऑफ नेचर (एससीएन) की स्थापना की। इससे जुडक़र करीब सवा सौ वैज्ञानिकों ने इंडियन नाइट्रोजन असेसमेंट नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की। जिसमें इसके दुष्परिणाम बताए गए हैं।
  • इसलिए अब सरकार किसानों को जैविक खेती की ओर लौटने की अपील कर रही है। ऐसी खेती करने वालों को आर्थिक मदद भी दे रही है। लेकिन किसान इसके लिए फिलहाल तैयार नहीं दिखते। आम किसानों में इस बात की चिंता है कि अगर वो रासायनिक खाद कम कर देंगे तो क्या अनाज और सब्जियां का उत्पादन पहले जैसा रह पाएगा?
  • जैविक खेती करने में चुनौतियां बहुत हैं. लेकिन हमें अंतत: अपनाना इसे ही पड़ेगा, क्योंकि रासायनिक खाद और कीटनाशक न सिर्फ हमारी सेहत को नुकसान पहुंचा रही है बल्कि पर्यावरण के लिए भी खतरा है। हरित क्रांति आधारित खेती में जो गेहूं-चावल की प्रजातियां हैं वो ज्यादा पानी और खाद पर निर्भर हैं। इससे जमीन बंजर होने का खतरा बढ़ रहा है।

कैसे पूरी होगी खाद की यह जरूरत ?

प्रो. साकेत कुशवाहा का कहना है फसल के लिए नाइट्रोजन जरूरी है। यूरिया में करीब 46 फीसदी नाइट्रोजन होता है. एक हेक्टेयर में 120 किलो नाइट्रोजन चाहिए यानी लगभग 300 किलो यूरिया. जबकि आर्गेनिक कंपोस्ट में नाइट्रोजन सिर्फ .05 फीसदी होता है। ऐसे में किसान इतनी खाद कहां से लाएगा, जबकि लोगों ने पशुओं को रखना कम दिया है।

किसान अपने खेतों में आमतौर पर सिर्फ यूरिया, फास्फोरस और पोटास डालता है जबकि सल्फर, आयरन और जिकं सहित 14 अन्य एलिमेंट की जरूरत होती है। जैसे सरसों की खेती में जिंक डालना चाहिए।  किसान को ऐसी शिक्षा कौन देता है? अगर वो जरूरत के हिसाब से बैलेंस बनाकर रासायनिक खाद का इस्तेमाल करता तो खेती की इतनी भयावह स्थिति नहीं होती। इसलिए अब केंद्र सरकार स्वायल हेल्थ कार्ड बना रही है।