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गोवर्धन पूजा-2019, जानिए गोवर्धन पूजा का मुहूर्त, महत्व और पूजा का विधि-विधान

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गोवर्धन पूजा का विधि-विधान- दीपावली के अगले ही दिन गोवर्धन पूजा की होती है। इसलिए गोवर्धन पूजा के दिन सुबह 5 बजे ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। अपने निवास स्थान या देवस्थान पर गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाएं। जिसके बाद गोवर्धन पूजा का अक्षत, पुष्प से विधि अनुसार पूजन करें। गोवर्धन पूजा का यह त्यौहार प्रकृति और मानव के बीच संबंधों को स्थापित करता है। इस दिन पशुधन की पूजा की जाती है। इस दिन सभी किसान अपनी पशुओं का श्रृंगार करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के अभिमान को तोडक़र बृजवासी पर्यावरण के महत्व को समझें और उसकी रक्षा करें यही उनका उद्देश्य था। इस दिन बहुत से श्रद्धालुओं के राज पर्वत की परिक्रमा भी करते हैं। उत्तर भारत में इस पर्व की अलग ही रौनक देखने को मिलती है। खासकर की मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल, बरसाना और ब्रज में यह पर्व बड़ी श्रद्धा और धूम-धाम से मनाया जाता है। तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं गोवर्धन पूजा का मुहूर्त, महत्व और पूजा का विधि-विधान

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गोवर्धन पूजा (भगवान गिरिराज) का महत्व

हिन्दू धर्म में गोवर्धन पूजा को विशेष महत्व दिया गया है। गोवर्धन पूजा के दिन गौ माता की पूजा की जाती है। गोवर्धन पर्वत ब्रज में स्थित है। यहां पर एक छोटी सी पहाड़ी है, इस पहाड़ी को पर्वतों का राजा माना जाता है, क्योंकि इस कलयुग में द्वापर युग का सिर्फ एक यही अवशेष ही वर्तमान समय में मौजूद है। यमुना नदी ने तो समय- समय पर अपनी दिशा बदलती रही। लेकिन गोवर्धन पर्वत एक ही स्थान पर आज भी अपने मूलभूत स्थान पर खड़ा है। गोवर्धन पर्वत को भगवान श्री कृष्ण के रूप में ही पूजा जाता है।

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पुराणों के अनुसार गोवर्धन पर्वत के महत्व को दर्शाते हुए कहा गया है – गोवर्धन पर्वतों के राजा और हरि के प्रिय हैं। इसके समान पृथ्वी और स्वर्ग में दूसरा कोई तीर्थ नहीं है। पुराणों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के अंहकार को तोड़ा था। जिसके पीछे उनका एक मात्र उद्देश्य ब्रज वासियों की रक्षा और गौ धन को बचाना था। गौ माता की महत्वता को बताने के लिए ही गोवर्धन पूजा की जाती है। क्योंकि गौ माता मनुष्य के जीवन में विशेष महत्व रखती हैं। गौ माता से प्राप्त चीजों की ही मनुष्य सेवन करता है।

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गोवर्धन पूजा 2019 शुभ मुहूर्त

  • गोवर्धन पूजा 2019- 28 अक्टूबर सोमवार
  • गोवर्धन पूजा मुहूर्त – शाम 3 बजकर 24 मिनट से शाम 5 बजकर 36 तक
  • प्रतिपदा तिथि प्रारंभ – सुबह 9 बजक 8 मिनट से (28 अक्टूबर 2019)
  • प्रतिपदा तिथि समाप्त -शाम 6 बजकर 13 मिनट तक (29 अक्टूबर 2019)

गोवर्धन पूजा का विधि-विधान

हिन्दू धर्म में इस दिन जो लोग गोवर्धन पूजा को मानते है वो अपने घर के आँगन में गाय के गोबर से गोवर्धन जी की मूर्ति बनाकर उनका पूजन करते है। गोवर्धन पूजा सुबह या शाम के समय की जाती है। पूजन के दौरान गोवर्धन पर धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल आदि चढ़ाएं जाते है, इसके बाद ब्रज के साक्षात देवता माने जाने वाले भगवान गिरिराज को प्रसन्न कराकर फूल, माला, धूप, चन्दन आदि से उनका पूजन किया जाता है।

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  • गोवर्धन पूजा के दिन सबसे पहले पूजा करने वाले व्यक्ति को स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए।
  • घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन की मूर्ति बनाएं। गोवर्धन पूजा सुबह या शाम के समय की जाती है। इसके बाद भगवान गिरिराज का स्मरण करते हुए अन्नकूट का भोग लगाएं।
  • इस दिन गाय और बैलों का विशेष पूजन किया जाता है। इसलिए गाय और बैल को स्नान कराकर उनका धूप, दीप, फूल और मालाओं से पूजन करें।
  • इसके बाद उनकी आरती उतारें और उन्हें फल व मिठाई से भोग लगाएं।
  • अंत में सभी को वही मिठाई प्रसाद के रूप में वितरण करें।

गोवर्धन पूजा व्रत कथा

गोवर्धन पूजा की शुरुआत भगवान कृष्ण ने द्वापर युग से की थी। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, इंद्र देव के प्रकोप से बचने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी चुटकी ऊँगली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था। और गोवर्धन पर्वत ने सभी की रक्षा की थी। तभी से कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा मनाई जाने लगी। इस दिन आँगन में गोबर से गोवर्धन बाबा की आकृति बनाई जाती है और उसका पूजन किया जाता है। पूजन के पश्चात् गोवर्धन बाबा की परिक्रमा की जाती है और अन्नकूट का भोग लगाया जाता है। गोवर्धन की प्रतिमा की नाभि के स्थान पर एक मिट्टी का दीपक जलाया जाता है। और गोवर्धन बाबा की नाभि में दूध, दही, गंगाजल, शहद, बताशे डाल दिए जाते हैं। इस दिन पूजन करने से घर में धन संपदा आती है और सदैव खुशहाली बनी रहती है।

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पौराणिक कथा के अनुसार द्वापर युग में ब्रज में इंद्र की पूजा की जाती थी। एक बार भी जब इंद्र की पूजा की जा रही थी। उस समय भगवान श्री कृष्ण उस पूजा में पहुंचे और पूजा के बारे में पूछने लगे। तब ब्रजवासियों ने बताया कि यह देवराज इंद्र की पूजा की जा रही है। इस पर भगवान श्री कृष्ण ने सभी नगरवासियों से कहा कि हमें इंद्र की पूजा करके कोई लाभ नही होता। वर्षा करना तो उनका कर्म और दायित्व है और वह सिर्फ अपना कर्म कर रहे हैं। लेकिन गोवर्धन पर्वत हमारी गायों का संरक्षण और भोजन उपलब्ध कराते हैं। जिसकी वजह से वातावरण भी शुद्ध होता है। इसलिए हमें इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। जिसके बाद सभी ने भगवान श्री कृष्ण की बात मानकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी शुरु कर दी। जिससे इंद्र क्रोधित हो उठे और मेघों को आदेश दिया की गोकुल का विनाश के दो।

इसके बाद गोकुल में भारी बारिश होने लगी और गोकुल वासी भयभीत हो उठे। भगवान श्री कृष्ण ने सभी गोकुल वासियों को गोवर्धन पर्वत के संरक्षण में चलने के लिए कहा। जिसके बाद श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका ऊँगली पर उठा लिया और सभी ब्रजवासियों की इंद्र के प्रकोप से रक्षा की।

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गोवर्धन पूजा – अन्नकूट उत्सव

गोवर्धन पूजा के दिन अन्नकूट का बहुत खास महत्व होता है। जो विशेष प्रकार का भोग होता है। इस भोग में कई तरह की सब्जियों को मिलाकर सब्जी बनाई जाती है और कई अनाजों को मिलाकर विशेष भोग तैयार किया जाता है। इस दिन चूरमा बनाने का भी विधान है। इस दिन दूध से बनी मिठाइयों और खिचड़ी का भी भोग लगाया जाता है। पूजन के बाद इन पकवानों को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को बांटा जाता है। कई मंदिरों में अन्नकूट उत्सव के दौरान जगराता किया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना कर उनसे खुशहाल जीवन की कामना की जाती है।