UP Politics - कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव संजीव आर्य संभालेंगे वेस्ट यूपी की कमान, चंद्रशेखर के गढ़ में राहुल गांधी ने चला बड़ा दांव 

 | 
UP Politics - कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव संजीव आर्य संभालेंगे वेस्ट यूपी की कमान, चंद्रशेखर के गढ़ में राहुल गांधी ने चला बड़ा दांव 

UP Politics - उत्तर प्रदेश का मिशन-2027 जैसे-जैसे करीब आ रहा है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सियासी मैदान दिलचस्प होता जा रहा है। कभी बसपा और मायावती के मजबूत प्रभाव वाले इस इलाके में अब दलित राजनीति की नई संभावनाओं को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला तेज हो रहा है। इसी सियासी समीकरण के बीच कांग्रेस ने पश्चिमी यूपी की कमान उत्तराखंड के युवा दलित नेता संजीव आर्य को सौंपकर बड़ा दांव खेला है।

कांग्रेस के इस फैसले को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठन को नए सिरे से खड़ा करने और दलित वोट बैंक के बीच पार्टी की मौजूदगी मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि पार्टी ने पहले राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया और अब पश्चिमी यूपी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र की जिम्मेदारी संजीव आर्य को दी है। ऐसे में दोनों नियुक्तियों को कांग्रेस की दलित केंद्रित रणनीति की अहम कड़ी माना जा रहा है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दलित सियासत में चंद्रशेखर आजाद लगातार अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। कभी मायावती और बसपा का मजबूत गढ़ माने जाने वाले पश्चिमी यूपी में अब दलित राजनीति के नए केंद्र के तौर पर चंद्रशेखर आजाद का नाम तेजी से उभरा है। चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते ग्राफ को देखकर पश्चिमी यूपी में अब संजीव आर्य को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। 

संजीव आर्य पर भरोसा, पश्चिमी यूपी की बड़ी जिम्मेदारी - 
कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश संगठन को छह जोन में बांटकर राष्ट्रीय सचिवों को अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी है। इनमें संजीव आर्य को वेस्ट जोन का प्रभारी बनाया गया है। उनके जिम्मे मेरठ, सहारनपुर और मुरादाबाद मंडल के 14 जिले होंगे। इस क्षेत्र में सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बुलंदशहर, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, हापुड़, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा और बिजनौर जैसे महत्वपूर्ण जिले शामिल हैं। पश्चिमी यूपी की राजनीति में इन जिलों की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है।

संजीव आर्य के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के कमजोर संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की होगी। इसके साथ ही दलित, जाट और ओबीसी समेत विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाना भी उनकी प्राथमिकताओं में शामिल माना जा रहा है।

यशपाल आर्य की सियासी विरासत का मिलेगा फायदा - 
संजीव आर्य उत्तराखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता यशपाल आर्य के बेटे हैं। यशपाल आर्य उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे हैं और मंत्री सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। संजीव आर्य खुद भी उत्तराखंड में विधायक रह चुके हैं। राजनीतिक परिवार से आने के कारण संगठन और चुनावी राजनीति का उन्हें लंबा अनुभव है। 

उत्तराखंड की सीमा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और मुजफ्फरनगर से लगती है। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर संजीव आर्य को पश्चिमी यूपी की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों से परिचित चेहरा माना जा रहा है। उनकी सबसे बड़ी ताकत दलित समाज से आने के साथ-साथ राजनीतिक अनुभव और उत्तराखंड से पश्चिमी यूपी की भौगोलिक नजदीकी को माना जा रहा है।

चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते प्रभाव के बीच कांग्रेस का दांव - 
पश्चिमी यूपी में दलित राजनीति की चर्चा अब केवल बसपा तक सीमित नहीं है। आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भी दलित राजनीति के बीच अपनी मजबूत पहचान बनाई है। ऐसे में कांग्रेस की ओर से दलित चेहरे को पश्चिमी यूपी की कमान सौंपे जाने को राजनीतिक विश्लेषक एक महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर देख रहे हैं।

कांग्रेस की रणनीति का मकसद सीधे तौर पर किसी एक दल या नेता को चुनौती देना है, यह पार्टी की ओर से स्पष्ट नहीं किया गया है। हालांकि राजनीतिक नजरिए से देखें तो पश्चिमी यूपी में संजीव आर्य की नियुक्ति कांग्रेस को दलित राजनीति में अपनी जगह मजबूत करने और चंद्रशेखर आजाद तथा अन्य दलों के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।

दलित-जाट समीकरण पर कांग्रेस की नजर - 
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और दलित मतदाताओं का चुनावी प्रभाव महत्वपूर्ण रहा है। कांग्रेस लंबे समय से इस क्षेत्र में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में संगठन की कमान एक दलित नेता को देना और साथ ही अलग-अलग सामाजिक समीकरणों के मुताबिक जोन स्तर पर जिम्मेदारियां तय करना पार्टी की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजेंद्र पाल गौतम को प्रदेश प्रभारी और संजीव आर्य को पश्चिमी यूपी की जिम्मेदारी दिए जाने से कांग्रेस ने अपने संगठन में दलित नेतृत्व को प्रमुखता दी है। पार्टी के लिए अब चुनौती इस रणनीति को जमीन पर उतारने की है।

WhatsApp Group Join Now