Nazool Land क्या होती है, जिस पर अतिक्रमण हटाने से हल्द्वानी में भड़क उठा दंगा, अंग्रेजों से जुड़े हैं इन जमीनों के तार
 

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Nazool Land - नजूल लेंड, हल्द्वानी हिंसा के बाद यह शब्द हर किसी की जुवां पर है की आंखिर क्या होती है नुजूल भूमि,दरअसल उत्तराखंड के हल्द्वानी में गुरुवार (8 फरवरी) को हिंसा भड़क उठी, और इस हिंसा की मुख्य वजह बनीं  ‘नजूल भूमि’ पर एक अवैध रूप से कथित मदरसा हटाना. जब यह कार्यवाही हुई तो इसके बाद लोग उग्र हो गए...... और देखने ही देखते यह आक्रोश हिंसा और आगजनी में बदल गया. और यह सब घटित हुआ नजूल की भूमि में अतिक्रमण को लेकर, लेकिन इस हिंसक घटना के बाद लोगों के जेहन में एक शब्द गढ़ गया जिसका नाम है नजूल, अक्सर लोग गाहे - बगाहे में नजूल की भूमि तो खरीद लेते हैं और फिर जिंदगी में पछतावा कर माथा पीटते हैं। हालाँकि जमीन को फ्री होल्ड कराने के भी नियम हैं, फ्री-होल्ड प्रॉपर्टी का मतलब है. ऐसी कोई भी रियल एस्टेट संपत्ति जिस पर उसके मालिक के अलावा और किसी का अधिकार नहीं होता है. इसके बारे में भी आगे विस्तार से बात करेंगे - 


तो चलिए जानते हैं कहाँ से आया नुजूल शब्द - 
लिहाजा इस शब्द की शुरुआत ब्रिटिश यानि आजादी से पहले अंग्रेजी काल में हुई. देश के अधिकांश शहरों, कस्बों वगैरह में ऐसे साइन बोर्ड आज भी मिलते हैं, जिन पर लिखा होता है- ‘यह नजूल की भूमि है’. ब्रिटिश शासन यानि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान, भारत में देसी रियासतें हुआ करती थीं. कुछ रियासतें तो ब्रिटिश हुकूमत की समर्थक रही, तो कुछ ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह यानि बगावत शुरू कर दी,  ब्रिटिश फौज और विद्रोह करने वाली रियासतों के बीच कई लड़ाइयां हुईं. युद्ध में जो राजा या विद्रोही हार जाता, अंग्रेजी हुकूमत वाली सरकार उनकी ज़मीन और प्रॉपर्टी जप्त कर लेते थे.


लिहाजा 1947 में भारत आजाद हुआ तो अंग्रेजों ने ये जमीनें खाली कर दीं, इसके बाद सरकार ने, जमीन मालिकों को उनके पट्टे वापस लौटाने शुरू कर दिए. लेकिन उस वक्त राजाओं और राजघरानों के पास इन जमीनों पर अपना, स्वामित्व ओनरशिप साबित करने के लिए उचित दस्तावेज़ों नहीं थे. कई जगहों पर जमीनों के वारिस नहीं मिले. ऐसे में सरकार ने इन ज़मीनों को ‘नजूल भूमि’ (Nazool Land) के रूप में चिह्नित किया. चूंकि अंग्रेजों के खिलाफ पूरे देश में विद्रोह हुआ था और विद्रोहियों की जमीनें कब्जे में ली गईं, इसीलिये पूरे भारत में नजूल की जमीनें आज भी पाई जाती हैं.


आजादी के बाद इन जमीनों पर वहां की राज्य सरकारों का स्वामित्व हो गया, राज्य सरकारों ने खाली पड़ी जमीनों को लीज पर देना शुरू कर दिया तब यह लीज 10 साल से लेकर 99 साल तक होती थी। ऐसे ही हल्द्वानी शहर और बनभूलपुरा का अधिकतर भू - भाग भी नजूल भूमि में बसा हुआ है, यहां भी आजादी के बाद लोगों ने कई एकड़ जमीनों की लीज में ले लिया, हालाँकि इन ज़मीनों का स्वामित्व उत्तराखंड सरकार का होता है और प्रबंधन यानी देखरेख नगर निगम करता है। लिहाजा लोग यह भूल जाते हैं कि यह जमीनें तो लावारिश हैं सरकार को क्या पता - लेकिन सरकार को पाई - पाई का हिसाब पता होता है हालाँकि कई बार लोग भूल जाते हैं की यह जमीन सरकार की है उनका इस पर किसी भी तरह का मालिकाना हक नहीं है। ऐसे में निकट भविष्य में अब उनके सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है।

उत्तराखंड में नजूल भूमि को लेकर नियम - 
ऐसे में सरकार आपको अधिकार देती है की आप इस जमीन में बस गए तो आप अपने रहने के लिए महज 500 से 1000 स्क्वायर फीट फ्री होल्ड करवा सकते हैं, इसके लिए साल 2009 के नजूल एक्ट में संशोधन कर उत्तराखंड सरकार 2021 में नजूल नीति लेकर आयी। ऐसे में लोग नजूल श्रेणी के अंतर्गत इस पॉलिसी में आने वाले पट्टे धारक फ्री होल्ड करवा सकते हैं । उसके लिए आपको अपने प्राधिकरण विभाग के नजूल अनुभाग में 150 रुपए देकर आवेदन करना होगा।  इसके बाद  नजूल भूखण्ड जमीन की 25 प्रतिशत धनराशि नियमानुसार शासकीय कोष में जमा करनी होगी तभी आपको उस भूमि का मालिकाना हक़ मिल सकता है। 
याद रखें सरकार ऐसी ज़मीनों को फ्री होल्ड नहीं करती है जिनकी या तो जनहित में, वर्तमान में आवश्यकता है या फिर निकट भविष्य में सरकार उस पर कोई प्रोजेक्ट लगाना चाहती हो। इसके साथ ही सड़क, नाले, बगीचे और पार्क को फ्री होल्ड नहीं किया जा सकता। यह राज्य सरकारों के पास अधिकार होते हैं। 

 

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