उत्तराखंड - फर्जी दस्तावेज से भारतीय पासपोर्ट हासिल करने का आरोप, 15 साल बाद CBI की कोर्ट से आचार्य बालकृष्ण बरी
 

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उत्तराखंड - फर्जी दस्तावेज से भारतीय पासपोर्ट हासिल करने का आरोप, 15 साल बाद CBI की कोर्ट से आचार्य बालकृष्ण बरी

देहरादून - बाबा रामदेव के सहयोगी और पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण को फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट मामले में देहरादून की सीबीआई अदालत ने सोमवार को बरी कर दिया। करीब डेढ़ दशक पुराने इस मामले में अदालत के फैसले से बालकृष्ण को राहत मिली है। मामला वर्ष 2011 में सामने आया था, जब उनके खिलाफ आरोप लगाया गया कि उन्होंने भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड के अनुसार शिकायत में उनकी भारतीय नागरिकता पर भी सवाल उठाए गए थे। 

मामला कैसे शुरू हुआ, इसकी कहानी वर्ष 2011 से जुड़ी है। 29 अप्रैल 2011 को हरिद्वार निवासी आचार्य प्रमोद कृष्णम की ओर से राष्ट्रपति को एक शिकायत भेजी गई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि बालकृष्ण भारतीय नागरिक नहीं हैं और उन्होंने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे भारतीय पासपोर्ट हासिल किया है। शिकायत आगे केंद्र सरकार के संबंधित विभागों से होते हुए सीबीआई तक पहुंची। इसके बाद सीबीआई ने 24 जुलाई 2011 को एफआईआर दर्ज की। 

सीबीआई ने बालकृष्ण के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी, जाली दस्तावेज को असली बताकर इस्तेमाल करने और पासपोर्ट अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज किया था। बाद में जांच पूरी कर 10 जुलाई 2012 को आरोपपत्र दाखिल किया गया। 

खुर्जा के संस्कृत कॉलेज की डिग्री पर था विवाद - 
सीबीआई का आरोप था कि बालकृष्ण ने पासपोर्ट बनवाने के लिए उत्तर प्रदेश के खुर्जा स्थित राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय से जुड़े कथित फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए थे। 2012 में दाखिल आरोपपत्र में सीबीआई ने इस संस्थान को लेकर भी जांच की थी। उस समय की रिपोर्टों के मुताबिक बरेली पासपोर्ट कार्यालय ने वर्ष 1998 में बालकृष्ण को भारतीय पासपोर्ट जारी किया था। 

मामले में शुरुआत में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 468, 471 और 120-बी तथा पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 के तहत आरोप तय किए गए थे। बाद में 2014 में देहरादून के सत्र न्यायालय के आदेश के बाद आरोपों में बदलाव किया गया और पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12(1)(बी) तथा आईपीसी की धारा 471 के तहत आरोप रखे गए। 

मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा। वर्ष 2025 में भी आचार्य बालकृष्ण सीबीआई अदालत में अपने बयान दर्ज कराने पहुंचे थे। उस दौरान अदालत में कथित फर्जी डिग्री से जुड़े साक्ष्यों और आरोपों को लेकर उनसे सवाल किए गए थे। अब करीब डेढ़ दशक बाद सीबीआई अदालत के फैसले में आचार्य बालकृष्ण को मामले में बरी कर दिया गया है। इससे उनके खिलाफ चले इस लंबे कानूनी विवाद का अंत हुआ है।

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