नैनीताल - पटवाडांगर की जमीन पर सवाल, न पैमाइश हुई, न मालिक का पता, फिर भी होटल के लिए दे दी जमीन – यशपाल आर्य
 

सरकारी दस्तावेजों में एक ही जमीन के चार मालिक और चार अलग-अलग रकबे दर्ज, 1 लाख करोड़ रुपये की सरकारी संपत्तियां निजी हाथों में सौंपने की तैयारी का आरोप
 
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नैनीताल - पटवाडांगर की जमीन पर सवाल, न पैमाइश हुई, न मालिक का पता, फिर भी होटल के लिए दे दी जमीन – यशपाल आर्य

नैनीताल - उत्तराखंड में सरकारी जमीनों और ऐतिहासिक धरोहरों को निजी हाथों में सौंपने के मामले को लेकर कांग्रेस ने धामी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार बाजार मूल्य के अनुसार करीब एक लाख करोड़ रुपये की सरकारी जमीनों और धरोहर संपत्तियों को 60 से 90 साल की अवधि के लिए निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पटवाडांगर की जमीन की पैमाइश तक नहीं हुई थी और सरकारी अभिलेखों में उसका मालिक स्पष्ट नहीं था, तो उसे होटल परियोजना के लिए कैसे आवंटित कर दिया गया?

बुधवार को कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य गुरदीप सप्पल, जिला कांग्रेस अध्यक्ष और अन्य कार्यकर्ताओं के साथ पटवाडांगर पहुंचे यशपाल आर्य ने 13.64 एकड़ जमीन और लोक निर्माण विभाग के ज्योलीकोट निरीक्षण भवन को उत्तराखंड निवेश एवं आधारभूत संरचना विकास बोर्ड (यूआईआईडीबी) के माध्यम से निजी हाथों में सौंपने का विरोध किया। इस दौरान उन्होंने बताया कि कांग्रेस ने प्रदेशभर में 'भूमि बचाओ-धामी हटाओ' अभियान शुरू किया है। अभियान के तहत प्रदेश के 11 स्थानों पर सरकारी संपत्तियों को बचाने के संकल्प के साथ रक्षा सूत्र बांधे गए।

यशपाल आर्य ने कहा कि इन संपत्तियों को निजी हाथों में देने से जुड़े फैसले मुख्यमंत्री ने अकेले लिए हैं, जबकि मंत्रिमंडल की शक्तियों का इस तरह अकेले प्रयोग करने का अधिकार मुख्यमंत्री को नहीं है। उन्होंने कहा कि यूआईआईडीबी अधिनियम भी मुख्यमंत्री को इस तरह के अधिकार नहीं देता। आर्य के अनुसार, सरकारी दस्तावेजों में लगभग 1,232 एकड़ जमीन यूआईआईडीबी और सिडकुल को देने के प्रस्ताव स्वीकृत हो चुके हैं। इसके अलावा लोक निर्माण विभाग के 25 निरीक्षण भवनों को निजी हाथों में देने की प्रक्रिया चल रही है और करीब 560 एकड़ अतिरिक्त भूमि देने की तैयारी है।

चार दस्तावेजों में चार मालिक और अलग-अलग रकबा- 

नेता प्रतिपक्ष ने पटवाडांगर की जमीन के रिकॉर्ड को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 15 जनवरी 2025 के नियोजन विभाग के शासनादेश में पटवाडांगर की 103 एकड़ जमीन को कृषि विभाग के स्वामित्व वाली बताया गया और इसमें से 23 एकड़ जमीन प्रीमियम रिसॉर्ट के लिए यूआईआईडीबी को दे दी गई। जबकि उस समय तक जमीन की पैमाइश नहीं हुई थी और न ही उसके संबंध में स्पष्ट राजस्व अभिलेख उपलब्ध थे।

आर्य के मुताबिक, इसके करीब आठ महीने बाद 4 सितंबर 2025 को राजस्व विभाग ने पटवाडांगर गांव का सर्वेक्षण और अभिलेख तैयार करने के लिए अधिसूचना जारी की। वहीं, 9 सितंबर 2025 को राजस्व परिषद ने जिलाधिकारी नैनीताल को पत्र लिखकर बताया कि यह 108 एकड़ भूमि वन विभाग और राजस्व विभाग के अभिलेखों में दर्ज नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जमीन का दर्ज मालिक ही स्पष्ट नहीं था तो सरकार ने उसे कृषि विभाग की जमीन बताकर आवंटित कैसे कर दिया?

उन्होंने बताया कि सरकारी दस्तावेजों में पटवाडांगर की इसी जमीन का स्वामित्व और रकबा अलग-अलग समय पर अलग-अलग बताया गया। अक्टूबर 2023 की बैठक में इसे जैव प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर से संबंधित करीब 60 एकड़ भूमि बताया गया। जून 2024 में इसे कृषि एवं उद्यान विभाग की 80 एकड़ जमीन बताया गया। जनवरी 2025 के शासनादेश में कृषि विभाग की 103 एकड़ भूमि का उल्लेख किया गया, जबकि अगस्त 2025 की बैठक में इसे जैव प्रौद्योगिकी परिषद स्थित भूमि बताया गया। सितंबर 2025 की अधिसूचना में इसका रकबा 108 एकड़ दर्ज किया गया।

आर्य ने कहा कि विश्वविद्यालय के लिए आरक्षित जमीन का रकबा भी अलग-अलग दस्तावेजों में कभी 30, कभी 15 और कभी 26.4 एकड़ बताया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी रिकॉर्ड में जमीन के मालिक और रकबे को लेकर स्पष्टता नहीं थी, इसके बावजूद पहले जमीन आवंटित कर दी गई और बाद में उसकी पैमाइश की प्रक्रिया शुरू हुई। अब इसी जमीन का 90 साल के लिए टेंडर भी जारी कर दिया गया है।

सीवर प्लांट की जमीन भी होटल परियोजना के लिए बदली - 

यशपाल आर्य ने नैनीताल शहर के सीवर ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का मामला भी उठाया। उन्होंने बताया कि जिलाधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में पटवाडांगर के अलावा एसटीपी के लिए कोई दूसरी जमीन उपलब्ध नहीं होने की बात कही थी। यह जमीन एशियाई विकास बैंक की परियोजना के लिए भी चयनित थी। इसके बावजूद अगस्त 2025 में प्लांट को वन भूमि पर स्थानांतरित करने के निर्देश दे दिए गए। इसके पीछे होटल परियोजना पर विपरीत प्रभाव पड़ने का तर्क दिया गया।

उन्होंने कहा कि अब पटवाडांगर की 13.64 एकड़ जमीन को 90 साल के लिए 37.80 करोड़ रुपये के रिजर्व प्राइस और पांच रुपये प्रति वर्गमीटर सालाना किराये पर देने की प्रक्रिया चल रही है, जबकि इसका बाजार मूल्य करीब 82 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। आर्य ने यह भी कहा कि पटवाडांगर में अंग्रेजों के समय से देश का प्रमुख वैक्सीन संस्थान रहा है। इसके साथ ही वर्ष 1871 में बने ज्योलीकोट निरीक्षण भवन को भी निजी हाथों में देने की सूची में शामिल किया गया है।

डाकपत्थर से धनौल्टी तक जमीनों के आवंटन पर सवाल - 

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जमीनों के आवंटन में अनियमितताओं का मामला केवल पटवाडांगर तक सीमित नहीं है। विकासनगर के डाकपत्थर में बंदोबस्त की प्रक्रिया जारी थी, इसके बावजूद दिसंबर 2025 में जमीन आवंटित कर दी गई और दस्तावेज में एक भी खसरा संख्या का उल्लेख नहीं किया गया। कॉर्बेट से लगे पाटकोट क्षेत्र का बंदोबस्त 22 महीने बाद भी पूरा नहीं हुआ था। वहीं, धनौल्टी-मगरा में जमीन आवंटित करने के बाद पता चला कि वहां वन विभाग के पट्टे आवंटित हैं।

उन्होंने कहा कि अगस्त 2025 में हुई सरकार की बैठक के दस्तावेजों में जमीन के मूल्य पर अगली बैठक में चर्चा करने और सरकारी जमीनों का लैंड बैंक बनाने की बात दर्ज है। इसके बावजूद जमीनें निजी हाथों में देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। आर्य ने सवाल उठाया कि जब जमीन का लैंड बैंक तैयार नहीं है, पैमाइश और मूल्यांकन पूरा नहीं हुआ है और संबंधित विभागों की सहमति भी स्पष्ट नहीं है तो जमीनों के आवंटन में इतनी जल्दबाजी क्यों की जा रही है?

नैनीताल की ऐतिहासिक संपत्तियां भी सूची में- 

यशपाल आर्य ने कहा कि नैनीताल जिले की कई अन्य बेशकीमती संपत्तियां भी निजी हाथों में देने की सूची में शामिल हैं। इनमें रामगढ़ की 15 एकड़ जमीन और वर्ष 1899 में बना रामगढ़ निरीक्षण भवन, कैंची धाम मार्ग पर स्थित वर्ष 1878 का रातीघाट निरीक्षण भवन, वर्ष 1866 का रानीबाग निरीक्षण भवन, राज्य के पैसे से खरीदी गई एचएमटी रानीबाग की 53 एकड़ जमीन और कॉर्बेट की सीमा पर स्थित पाटकोट की 37 एकड़ जमीन शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि जिले की ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण संपत्तियों को एक-एक कर बड़े होटल समूहों के हवाले किया जा रहा है।

गरीबों को जमीन नहीं, निजी कंपनियों को हजारों एकड़ देने का आरोप - 

आर्य ने सरकार की भूमि नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में जल विद्युत परियोजनाओं, सड़कों और अन्य विकास कार्यों के लिए वन भूमि के उपयोग के बदले क्षतिपूरक वनीकरण के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं है। प्रदेश के ऊर्जा एवं नियोजन विभाग के प्रमुख सचिव ने भी किशाऊ बांध परियोजना के क्षतिपूरक वनीकरण के लिए करीब 2,000 एकड़ जमीन की जरूरत बताई है।

उन्होंने कहा कि भूमिहीन गरीबों, विशेषकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के परिवारों को आवास उपलब्ध कराने के लिए भी सरकार के पास जमीन नहीं है। दूसरी ओर, यही सरकार 1,232 एकड़ सरकारी जमीन निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है। आर्य ने इसे गरीबों, दलितों और जनजातीय समुदायों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया।

जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की लीज का मामला भी उठाया - 

नेता प्रतिपक्ष ने जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की 142 एकड़ जमीन का मामला भी उठाया। उन्होंने कहा कि इस जमीन को करीब एक करोड़ रुपये सालाना किराये पर निजी कंपनी को देने का मुद्दा उन्होंने विधानसभा में उठाया था, लेकिन सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। आर्य के अनुसार, कांग्रेस ने केदारनाथ उपचुनाव से पहले सितंबर-अक्टूबर 2024 में प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मामले को सबसे पहले सार्वजनिक किया था। उन्होंने कहा कि वर्ष 2004 में कांग्रेस की एनडी तिवारी सरकार ने बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीद की सीमा तय की थी। वहीं, वर्ष 2018 में भू-कानून में किए गए बदलावों का कांग्रेस ने सदन से लेकर सड़क तक विरोध किया था।

निविदाएं निरस्त करने और सीबीआई जांच की मांग - 

यशपाल आर्य ने धामी सरकार से मांग की कि सरकारी जमीनों से संबंधित सभी निविदाएं तत्काल निरस्त की जाएं और यूआईआईडीबी को दी गई जमीनें संबंधित विभागों को वापस की जाएं। उन्होंने सरकारी भूमि पर अंतिम अधिकार मुख्यमंत्री को देने से संबंधित 22 दिसंबर 2022 के कैबिनेट निर्णय को वापस लेने की भी मांग की।

इसके साथ ही उन्होंने जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की लीज रद्द करने और पूरे मामले की उच्च न्यायालय की निगरानी में सीबीआई जांच कराने की मांग उठाई। आर्य ने कहा कि उत्तराखंड की जमीन, अस्मिता और संपत्तियों की रक्षा के लिए कांग्रेस संघर्ष जारी रखेगी।

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