Navratri 2026 - जब शिव उठा ले गए सती का शरीर, विष्णु के चक्र से प्रकट हुआ उत्तराखंड का पूर्णागिरि शक्तिपीठ, पढ़िए महिमा
Purnagiri Temple Shakti Peeth Uttarakhand - उत्तराखंड के चंपावत जिले में टनकपुर से लगभग 24 किलोमीटर दूर अन्नपूर्णा चोटी पर स्थित मां पूर्णागिरि धाम देश के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। यह पवित्र स्थल मां सती के 51 शक्तिपीठों में शामिल माना जाता है, जहां उनकी नाभि गिरने की मान्यता है। इसी कारण यहां मां पूर्णागिरि के रूप में देवी की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब मां सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर आत्मदाह किया, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर आकाश मार्ग से जा रहे थे। इस दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 भाग किए, जो विभिन्न स्थानों पर गिरकर शक्तिपीठों के रूप में प्रसिद्ध हुए। अन्नपूर्णा चोटी पर गिरा नाभि स्थल आज पूर्णागिरि शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है।
नेपाल तक फैली आस्था की डोर -
मां पूर्णागिरि धाम में न केवल भारत बल्कि नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। वर्ष भर यहां पूजा-अर्चना होती रहती है, लेकिन चैत्र नवरात्र से पूर्व शुरू होने वाले लगभग 90 दिनों के विशेष मेले में 30 लाख से अधिक श्रद्धालु माता के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां पूर्णागिरि के दर्शन के बाद नेपाल स्थित सिद्धबाबा मंदिर में शीश नवाने से यात्रा पूर्ण मानी जाती है। इस परंपरा का पालन आज भी हजारों भक्त करते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि -
मंदिर की स्थापना वर्ष 1632 में श्रीचंद तिवारी द्वारा की गई थी। कहा जाता है कि गुजरात निवासी श्रीचंद तिवारी को मां पूर्णागिरि ने स्वप्न में नाभि स्थल पर मंदिर निर्माण का आदेश दिया था। इसके बाद उन्होंने चंपावत के तत्कालीन चंद राजा ज्ञान चंद के संरक्षण में इस धाम की स्थापना कर विधिवत पूजा-अर्चना शुरू की। तब से यह स्थल आस्था और भक्ति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
विशेष आकर्षण और धार्मिक परंपराएं -
धाम में प्रवेश से पहले भक्त भैरव मंदिर में बाबा भैरवनाथ के दर्शन करते हैं, जिन्हें मां का द्वारपाल माना जाता है। मान्यता है कि उनके दर्शन के बाद ही मां के दरबार में प्रवेश संभव होता है। इसके अलावा काली मंदिर और ‘झूठा मंदिर’ भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं।
‘झूठा मंदिर’ से जुड़ी कथा के अनुसार, एक सेठ ने पुत्र प्राप्ति के बाद सोने का मंदिर चढ़ाने का वचन दिया था, लेकिन उसने तांबे पर सोने का पानी चढ़ाकर मंदिर बनवाया। जब इसे धाम ले जाया जा रहा था, तो एक स्थान पर विश्राम के बाद यह मंदिर आगे नहीं बढ़ सका। तभी से यह ‘झूठा मंदिर’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया और आज भी श्रद्धालु यहां पूजा करते हैं।
नवरात्र में उमड़ती आस्था की भीड़ -
चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ नेपाल से भी हजारों भक्त मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मां पूर्णागिरि को मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी माना जाता है। यही कारण है कि हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहां आकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं और मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
