नैनीताल - हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी सेना के जवान को दी राहत, कोर्ट ने आपसी सहमति से बने संबंधों पर कही यह बात 

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नैनीताल - हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपी सेना के जवान को दी राहत, कोर्ट ने आपसी सहमति से बने संबंधों पर कही यह बात

नैनीताल - उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने सेना में कार्यरत एक जवान के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म और अपहरण के मुकदमे को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों को, केवल बाद में विवाह से इन्कार कर देने के आधार पर, स्वतः दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आपराधिक कानून का उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध या असफल रिश्तों के निपटारे के साधन के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि जहां आरोप प्रथमदृष्टया निराधार हों, वहां आरोपी को लंबी आपराधिक प्रक्रिया से गुजरने के लिए बाध्य करना कानून का दुरुपयोग होगा।

मामला क्या था - 
प्रकरण पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग थाने से संबंधित है। वर्ष 2022 में एक युवती ने गुरपाल सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोप था कि शादी का झांसा देकर उसे घर से बाहर बुलाया गया और एक होटल में ले जाकर शारीरिक संबंध बनाए गए। बाद में शादी से इन्कार करने पर युवती ने अपहरण और दुष्कर्म का मामला दर्ज कराया।

कोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने दस्तावेजों और बयान का अवलोकन करते हुए पाया कि दोनों पक्ष वर्ष 2019 से एक-दूसरे को जानते थे और इंटरनेट मीडिया के माध्यम से संपर्क में थे। न्यायालय ने कहा कि युवती बालिग थी और वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ गई थी, ऐसे में अपहरण का आवश्यक तत्व सिद्ध नहीं होता।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि शादी के वादे पर बने यौन संबंध तभी दुष्कर्म माने जा सकते हैं, जब यह प्रमाणित हो कि आरोपी की नीयत प्रारंभ से ही धोखा देने की थी। इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने शुरू से ही विवाह न करने के इरादे से सहमति प्राप्त की थी।

23 फरवरी 2022 की मेडिकल रिपोर्ट में भी जबरन शारीरिक संबंध या बल प्रयोग की पुष्टि नहीं हुई। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष के पास ऐसा ठोस आधार नहीं था, जिससे दुष्कर्म का अपराध प्रथमदृष्टया स्थापित हो सके।अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में न्याय सुनिश्चित करने और अनावश्यक उत्पीड़न रोकने के लिए धारा 482 के तहत प्राप्त अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग आवश्यक है। इसी आधार पर अदालत ने दर्ज मुकदमे को निरस्त करने का आदेश दिया।

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