नैनीताल - कैंची धाम में करोड़ों-अरबों रुपये का कोई हिसाब नहीं, हाईकोर्ट ने डीएम, सरकार और ट्रस्ट को नोटिस, इतने दिन में दें जवाब 

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नैनीताल - कैंची धाम में करोड़ों-अरबों रुपये का कोई हिसाब नहीं, हाईकोर्ट ने डीएम, सरकार और ट्रस्ट को नोटिस, इतने दिन में दें जवाब 

नैनीताल - उत्तराखंड के प्रसिद्ध संत बाबा नीब करौरी महाराज द्वारा स्थापित कैंची धाम में कथित अव्यवस्थाओं और वित्तीय अनियमितताओं का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार, जिलाधिकारी नैनीताल, एसडीएम कैंची धाम तथा मंदिर ट्रस्ट को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। याचिका में मांग की गई है कि कैंची धाम मंदिर ट्रस्ट को जागेश्वर धाम और बद्री-केदारनाथ मंदिर समिति की तर्ज पर सीमित सरकारी नियंत्रण में लाया जाए, ताकि प्रशासनिक और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।

ट्रस्ट की पारदर्शिता पर सवाल - 
पिथौरागढ़ जिले के ग्राम बासीखेत, पोस्ट देवराड़ी पंत निवासी व्यक्ति द्वारा मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए चार पृष्ठों के पत्र में आरोप लगाया गया है कि 1960 के दशक में स्थापित कैंची धाम देश-विदेश के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है, लेकिन मंदिर ट्रस्ट के संचालन से जुड़ी कोई भी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। न तो ट्रस्ट की वेबसाइट है, न ही आय-व्यय का ब्योरा सार्वजनिक किया जाता है।

पत्र में कहा गया है कि स्थानीय प्रशासन—तहसील कैंची धाम, रजिस्ट्रार कार्यालय नैनीताल और जिलाधिकारी कार्यालय—को भी ट्रस्ट के पंजीकरण और संरचना की स्पष्ट जानकारी नहीं है। आरोप है कि मंदिर में प्राप्त नकद चढ़ावे का कोई पारदर्शी लेखा-जोखा नहीं रखा जाता और करोड़ों-अरबों रुपये के उपयोग को लेकर संदेह की स्थिति बनी हुई है।

पंजीकरण और ऑडिट पर उठे प्रश्न - 
याचिका में कहा गया है कि धार्मिक ट्रस्टों का पंजीकरण एवं संचालन भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 के तहत होता है, लेकिन कैंची धाम ट्रस्ट का पंजीकरण किस रजिस्ट्रार कार्यालय में हुआ, यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। नैनीताल रजिस्ट्रार कार्यालय ने भी ऐसे किसी ट्रस्ट के पंजीकरण की जानकारी होने से अनभिज्ञता जताई है।

याचिकाकर्ता ने ट्रस्ट की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करने, ट्रस्ट के नाम दर्ज अचल संपत्तियों का विवरण जारी करने तथा स्थानीय ग्रामवासियों द्वारा दान की गई भूमि की जानकारी सामने लाने की मांग की है। साथ ही, भूमि दान करने वाले स्थानीय लोगों को ट्रस्ट में ट्रस्टी के रूप में शामिल करने की भी मांग उठाई गई है।

मूलभूत सुविधाओं का मुद्दा - 
पत्र में यह भी आरोप लगाया गया है कि श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के अनुरूप पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। कुछ माह पूर्व ट्रस्ट द्वारा 2.5 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए जाने का उल्लेख करते हुए वित्तीय प्रबंधन की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए गए हैं।
हाईकोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब राज्य सरकार और संबंधित पक्षों के जवाब का इंतजार है। मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होने की संभावना है।

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