भीमताल - तीन मौतों के बाद वन विभाग और जनप्रतिनिधि सवालों के घेरे में, आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं, जनता को किया जा रहा है गुमराह?
भीमताल - उत्तराखंड में वन्यजीव हमलों को लेकर एक बार फिर वन विभाग की कार्यप्रणाली और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला केवल बाघ या तेंदुए के हमले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन की सुरक्षा, प्रशासनिक पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने से जुड़ा हुआ है। नैनीताल जिले में इन दिनों भीमताल और रामनगर में बाघ/ तेंदुए का आतंक चरम पर है। लगातार हो रहे हमलों से ग्रामीण दहशत में हैं।
पौड़ी गढ़वाल - दबाव के बाद वन मंत्री को देना पड़ा लिखित आदेश -
बीते नवंबर माह में पौड़ी गढ़वाल जिले में तेंदुए के हमलों से ग्रामीणों में दहशत का माहौल था। लगातार हो रहे हमलों से आक्रोशित ग्रामीणों ने प्रदर्शन और विरोध तेज किया, जिसके बाद वन मंत्री सुबोध उनियाल को तेंदुए को मारने का लिखित आदेश जारी करना पड़ा। यह आदेश व्हाट्सएप के माध्यम से सार्वजनिक हुआ, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि दबाव पड़ने पर प्रशासन लिखित कार्रवाई भी करता है।
भीमताल - तीन मौतें, लेकिन अब भी आदेश पर अस्पष्टता -
इसके विपरीत नैनीताल जिले के भीमताल क्षेत्र में हालात कहीं अधिक गंभीर होते जा रहे हैं। गांव- गांव में वन्य जीवों के गुर्राहट से लोग दहशत में हैं, बीते एक महीने में बाघ के हमले में ओखलकांडा और धारी में तीन महिलाओं की मौत हो चुकी है, हर बार वन विभाग और जनप्रतिनिधि हमले में मृत महिलाओं का शव उठाने तक उन्हें मौखिक आदेश होने की बात करते हैं, उसके बाद किसी को कोई मतलब नहीं रहता और अगली मौत का इंतजार रहता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर घटना के बाद वन विभाग के अधिकारी और जनप्रतिनिधि फोन पर मौखिक बातचीत कर आश्वासन देते हैं। लेकिन आदमखोर बाघ को न तो पकड़ा जा रहा है और न ही मारा जा रहा है। लोगों का आरोप है वन विभाग के अधिकारी ज़मीनी स्तर पर यह कहते नजर आते हैं कि बाघ को मारने का कोई लिखित आदेश नहीं मिला है।
विधायक और DFO के बीच हुई बहस -
रविवार को देवस्थल के पास हुई महिला की मौत के बाद एक वीडियो वायरल हो रहा है। जिसमें विधायक और डीएफओ के बीच बहस हो रही है। लोगों ने बताया कि DFO कह रहे हैं कोई भी मारने का आदेश अब तक जारी नहीं हुआ है। वहीं विधायक राम सिंह कैड़ा दावा कर रहे हैं कि बाघ को मारने का आदेश जारी किया जा चुका है। इस विरोधाभास ने जनता को असमंजस में डाल दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि— अगर आदेश जारी हो चुका है तो DFO उसका खंडन क्यों कर रहे हैं? अगर आदेश नहीं है, तो जनप्रतिनिधि किस आधार पर जनता को आश्वस्त कर रहे हैं? लिखित आदेश होने की स्थिति में उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
राजनीतिक बयानबाज़ी का आरोप -
स्थानीय लोगों का आरोप है कि पूरा मामला राजनीतिक श्रेय लेने और बयानबाज़ी की भेंट चढ़ गया है। फोन पर “काम हो गया” जैसे आश्वासन देकर जनता को शांत करने की कोशिश की जाती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है— क्या व्यवस्था में मानव जीवन की प्राथमिकता पीछे छूटती जा रही है? या फिर स्पष्ट निर्णय लेने से जानबूझकर बचा जा रहा है, ताकि जिम्मेदारी तय न हो?
जनता की स्पष्ट मांग -
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि— वन्यजीव हमलों से जुड़े मामलों में हर आदेश लिखित और सार्वजनिक किया जाए मौखिक बयानों की जगह दस्तावेज़ी पारदर्शिता अपनाई जाए तथा राजनीति से ऊपर उठकर मानव जीवन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए लोगों का कहना है कि जब पौड़ी गढ़वाल में आदेश सार्वजनिक हो सकता है, तो भीमताल में ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा।
