देहरादून - उत्तराखंड में वोट चोरी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर, राज्य चुनाव आयोग पर लगाया भारी भरकम इतना जुर्माना
नई दिल्ली/देहरादून - उत्तराखंड में पंचायत चुनावों के दौरान कथित वोटर मैनिपुलेशन (वोट की हेराफेरी) मामले पर अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए राज्य चुनाव आयोग पर ₹2 लाख का जुर्माना लगा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना को लेकर उठाया।
क्या है पूरा मामला?
जनवरी 2025 में शहरी निकाय चुनावों (Urban Local Body Elections) के लिए वोटर लिस्ट बदली गई थी। आरोप है कि BJP ने गांवों में रहने वाले अपने कार्यकर्ताओं को शहरों की वोटर लिस्ट में शिफ्ट कराया, ताकि वे शहरी निकाय चुनावों में फर्जी वोटिंग कर सकें। अब, जब मई-जून में पंचायत चुनाव आ गए, तो इन कार्यकर्ताओं को वापस गांव की वोटर लिस्ट में जोड़ने की कोशिश की गई — और जब यह मुमकिन नहीं हुआ, तो उनका नाम दूसरी जगह नए सिरे से जोड़ दिया गया, जिससे वे दो-दो जगह के वोटर बन गए।
कांग्रेस ने उठाई थी आपत्ति -
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा ने इस पर आपत्ति जताई और चुनाव आयोग को बार-बार पत्र लिखकर चेताया कि वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए कम से कम 6 महीने का निवास जरूरी होता है। दो जगह नाम होना गंभीर उल्लंघन है और ऐसे उम्मीदवारों का नामांकन रद्द होना चाहिए। परंतु चुनाव आयोग ने इन आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया और BJP से जुड़े ऐसे उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी।
हाई कोर्ट का आदेश और चुनाव आयोग की अवहेलना -
मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने उत्तराखंड पंचायत राज अधिनियम, 2016 की धारा 9(6) और 9(7) के तहत स्पष्ट निर्देश दिए कि दोहरी वोटर लिस्ट वाले उम्मीदवारों का नॉमिनेशन रद्द किया जाए। बावजूद इसके, उत्तराखंड राज्य चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार -
आज सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के इस रवैये को गंभीरता से लिया और कहा कि “यह न केवल कानून की अवहेलना है, बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी भावना के खिलाफ है।” इसके साथ ही, उत्तराखंड राज्य चुनाव आयोग पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया गया।
“वोट चोरी” पर लगी सुप्रीम कोर्ट की मुहर -
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे ‘वोट चोरी’ का खुला खेल बताया है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग की गलती को स्वीकार करते हुए दंड दिया है, तो यह पूरे मामले पर एक संवैधानिक मुहर मानी जा रही है।
