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भाजपा को 2 से 180 सीट तक पहुंचाने वाले लालकृष्ण आडवाणी की ऐसे हुई विदाई, कुछ ऐसा रहा राजनीतिक सफर

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नई दिल्ली-न्यूज टुडे नेटवर्क : बीजेपी के उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की जिसमें 184 नाम शामिल हैैं। इस लिस्ट में सबसे बड़ा सरप्राइज तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के नाम का है जो गांधीनगर से चुनाव लड़ेंगे। लेकिन इसका सीधा मतलब यही है कि लालकृष्ण आडवाणी चुनावी सीन से आउट हो चुके हैं। क्योंकि गांधीनगर से छह बार सांसद आडवाणी 91 साल के हो चुके हैं और इस बार बीजेपी की तरफ से ये संकेत मिल रहे थे कि 75 की उम्र के पार नेताओं को टिकट ना देने का पार्टी ने पक्का मन बना रखा है। जानते हैं गांधीनगर के लोगों सेे कि वह बीजेपी के इस फैसले केे बारे में क्या सोचते हैं।

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आडवाणी का कुछ इस तरह रहा राजनीतिक सफर

अटल बिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने अपना राजनैतिक सफर लगभग एक साथ शुरू किया था। दोनों जनसंघ की स्थापना से जुड़ रहे। आगे चलकर देश में पहली गैर कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी तो दोनों उस सरकार में मंत्री बने। समय से पहले ही जनता पार्टी सरकार का अंत हो गया तो दोनों ने मिलकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी की नींव डाली। अटल बिहारी बाजपेयी अध्यक्ष बने तो आडवाणी ने महासचिव की जिम्मेदारी निभाते हुए पार्टी को आगे बढ़ाने में मेहनत की। अगले आम चुनाव 1984 में शिरकत करते हुए पार्टी ने दो सीटों पर अपना खाता खोला। अटल बिहारी बाजपेयी के बाद आडवाणी अध्यक्ष बने। बाजपेयी के नेतृत्व वाली उदारवादी रणनीति सफल होते न देख हिन्दुत्व के नाम पर हिन्दू कट्टरता को बढ़ावा देने का फैसला लिया। इस फैसले के आधार पर आडवाणी संगठन को लेकर आगे बढ़े। इसी दरमियान बोफोर्स का जिन्न बाहर आ गया। वीपी सिंह ने कुछ दलों को मिलाकर राष्ट्रीय मोर्चे का गठन किया।

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जब कई राज्यों में बनीं भाजपा की सरकार

आम चुनाव हुए तो आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा भी जोशो खरोश के साथ मैदान में उतरी। उसने 85 सीटों पर कब्जा जमाया। भाजपा और वामदलों के सहयोग से वीपी सिंह ने सत्ता संभाली। करीब एक साल बाद अगस्त 1990 में उन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का ऐलान किया तो देश के एक बढ़े तबके में आक्रोश फैल गया। हालांकि वह बीच में ही गिरफ्तार कर लिए गए, लेकिन इस यात्रा ने आडवाणी का राजनीतिक कद काफी ऊपर पहुंचा दिया। उनकी इस यात्रा से संगठन को भारी लाभ हुआ। अगले आम चुनाव में जहां उसके खाते में 120 सीटें आ गिरीं वहीं उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में भाजपा की सरकार बन गई। इसी प्रयास से आडवाणी अपने दूसरे अध्यक्षीय कार्यकाल में हुए आम चुनाव 1996 व 1998 में सीटों की संख्या क्रमश: 161 और 182 तक पहुंचाने में कामयाम रहे।

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जब राजनीतिक सफर में आई गिरावट

2005 से ही गिरावट आने लगी थी जब पाकिस्तान जाकर उन्होंने जिन्ना संबंधी बयान दिया था। इस बयान से उनकी पार्टी पर पकड़ कम होने लगी थी और संघ में भी उनकी छवि को संदिग्ध नजरों से देखा जाने लगा था। हालांकि आडवाणी ने वह बयान जान बूझकर दिया था। गठबंधन सरकारों का माहौल देखते हुए वह कट्टर हिन्दूवादी वाली अपनी छवि से बाहर आकर एक उदारवादी व्यक्तित्व का चोला पहनना चाहते थे। कुछ इसी तरह के चोले ने अटल बिहारी को करीब दो दर्जन दलों वाली गठबंधन सरकार का मुखिया बना दिया था।

कांग्रेस का तंज, अब आडवाणी की सीट भी छीन ली

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवारों की पहली सूची जारी होने के बाद कांग्रेस ने प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने गांधीनगर सीट से लालकृष्ण आडवाणी को टिकट नहीं मिलने पर भाजपा पर कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि भाजपा ने पहले उन्हें मार्गदर्शक मंडल में भेजा और अब उनकी सीट भी छीन ली। सुरजेवाला ने कहा कि ‘देश को बचाने के लिए भाजपा को भगाना जरूरी है।’ भाजपा ने यूपी में इस बार अपने छह मौजूदा सांसदों को टिकट नहीं दिया है। सुरजेवाला ने अपने ट्वीट में कहा, ‘पहले श्री लाल कृष्ण आडवाणी को जबरन मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया। अब उनकी संसदीय सीट छीन ली।