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जानिये कैसे होती है बद्रीनाथ धाम में पूजा, क्यों कहते है इसे धरती का वैकुण्ठ

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बद्रीनाथ धाम की बड़ी मान्यता है। हर साल यहां लाखों भक्त दर्शन को आते है। आज तडक़े 4.30 बजे बद्रीनाथ धाम के कपाट खोल दिए गए। कपाट खोलने की विधियां रात 3 बजे से ही शुरू हो गई थीं। रावल ईश्वर प्रसाद नंबूदरी द्वारा विशेष पूजा-अर्चना की गई। आज गुरु शंकराचार्यजी की गद्दी, उद्धवजी, कुबेरजी की पूजा की गई। कपाट खुलने के बाद लक्ष्मी माता को परिसर स्थित मंदिर में स्थापित किया। भगवान बद्रीनाथ का तिल के तेल अभिषेक किया गया।हर साल हजारों भक्तों के सामने यहां कपाट खोले जाते हैं। लेकिन इस बार कोरोना वायरस के चलते भक्तों के आने पर अभी रोक है। बद्रीनाथ धाम अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है।

ऐसे होती है पूजा

कपाट खुलने के बाद बद्रीनाथ के साथ ही भगवान धनवंतरि की भी विशेष पूजा की गई। धनवंतरि आयुर्वेद के देवता हैं। बद्रीनाथ का तिल के तेल से अभिषेक होता है और ये तेल यहां टिहरी राज परिवार से आता है। टिहरी राज परिवार के आराध्य बद्रीनाथ हैं। रावल राज परिवार के प्रतिनिधि के रूप में भगवान की पूजा करते हैं। यहां परशुराम की परंपरा के अनुसार पूजा की जाती है।

कौन थे रावल

बद्रीनाथ की पूजा करने वाले पुजारी को रावल कहा जाता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने चारों धामों के पुजारियों के लिए विशेष व्यवस्था बनाई थी। इसी व्यवस्था के आगे बढ़ाते हुए बद्रीनाथ में केरल के रावल पूजा के लिए नियुक्त किए जाते हैं। सिर्फ रावल को ही बद्रीनाथ की प्रतिमा छूने का अधिकार होता है।

धरती का वैकुण्ड है बद्रीनाथ

बद्रीनाथ को धरती का वैकुण्ठ भी कहा जाता है। यह मंदिर तीन भागों गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप में बांटा गया है। बद्रीनाथ जी के मंदिर के अन्दर 15 मूर्तियां स्थापित हैं। भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा है। मान्यता है कि आज जहां ये धाम स्थित है, वहां पहले भगवान शिव निवास किया करते थे, लेकिन बाद में भगवान विष्णु इस जगह पर रहने लगे।

बताते है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु न केवल एक-दूसरे को बहुत मानते थे, बल्कि दोनों एक-दूसरे के आराध्य भी थे। मान्यता के अनुसार बद्रीनाथ धाम में छह महीने मानव और छह माह देव पूजा होती है। शीतकाल के दौरान देवर्षि नारद यहां भगवान नारायण की पूजा करते हैं। इस दौरान भगवान बद्री विशाल के मंदिर में सुरक्षा कर्मियों के सिवा और कोई भी नहीं रहता।

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