महिला दिवस विशेष : क्या महिलाएं इतने वर्षों में आजाद हो चुकी हैं, जानिए आखिर क्यों खौफ में जी रहीं महिलाएं

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हल्द्वानी-न्यूज टुडे नेटवर्क : 8 मार्च यानि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जिधर नजर डालो उधर इस दिन धूम ही धूम है। दुनिया जहान की उन महिलाओं के नाम फिर सामने आ रहे हैं, जिन्होंने पुरुषों के इस समाज में अपनी एक जगह बनाई है। वो महिला गागा हो या एंजेलिना जोली या मेनका गांधी या दीपा मेहता या अंजलि इला मेनन या शोभा डे….इनके साहस और हिम्मत की दाद दी जाएगी और फिर उम्मीद भी की जाएगी कि दुनिया की सारी महिलाओं को इन उपलब्धियों को सुनकर खुशी ही होना चाहिए और तो और इन सारे ढोंग और दिखावों में महिला संगठन ही सबसे बढ़-चढक़र हिस्सा लेते हैें।

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क्या यही है महिलाओं की आजादी का मतलब

आखिर क्यों घर के अंदर और बाहर महिलाएं खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं? जो हर क्षण बर्दाश्त करती है समाज के बहसी दरिदों को…हर पल झेलती है बेचारगी का अहसास कराती ‘सहानुभूति’… जो हर पल उसे याद दिलाती कि ‘भूल मत जाना! “वैसा” हुआ था तेरे साथ’…हर दिन सहती है अपने शरीर पर टिकी हजारों नापाक नजऱों को…और अपनी हालत पर तरसते हुए सहमते हुए बस यही सवाल करती है आखिर कब होगा इस समाज को प्रायश्चित होगा….कब एक मां अपनी बेटी को दुपट्टा खोल कर ओढऩे और नजऱें नीची कर चलने की हिदायत देना बंद करेगी…कब कोई बाप अपने बेटे को किसी लडक़ी को ग़लत नजऱ उठाकर न देखने की नसीहत देगा….कब कैंडल जलाने, पोस्टर उठाने, नारे लगाने का दौर थमेगा….और कब लोगों की विकृत मानसिकता में बदलाव आएगा…और कब सरकारें आईने दिखाते इन आंकड़ों को सामने से हटाने की बजाए इनसे सबक लेकर समाज का चेहरा सुधारने की पहल करेंगी।

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क्या हमें अपने आप का इस तरह से समारोह करने की जरूरत है? क्या एक महिला होने को या उसके अधिकारों के लिए एक दिन ही काफी है? क्या यह बात रोजाना की जिंदगी में नहीं होना चाहिए? आखिर क्यों किसी महिला लडक़ी को याद दिलाने की जरूरत पड़ती है कि वह तुम्हारे अंदर कितनी ताकत है। तुम भी सबके बराबर हो। तुम्हारे अंदर भी प्रतिभा और तुम भी कुछ कर सकती हो। क्या यह सभी बातें इंसान के जन्म से ही उसे दिखाई और समझाई नहीं जानी चाहिए ताकि बड़े और समझदार होने पर वो दूसरे इंसानों से बराबरी कर सके।

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नहीं चाहिए हमें यह एक दिन का एसान। यह दिखावा ज्यादा तकलीफ देता है बजाय साल भर के उस दोयम दर्जे के जीवन से…. अगर कुछ बदलना ही है तो वह भेदभाव बंद होना चाहिए जो यह दिन मनाने के लिए कारण है क्योंकि इस महिला दिवस समारोह से ही मुक्ति की जरूरत है।