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नई दिल्ली- देश के सबसे बड़े रेल-सड़क पुल का जाने क्या है इतिहास, पीएम मोदी आज करेंगे उद्घाटन

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नई दिल्ली- न्यूज टुडे नेटवर्क: असम के डिब्रूगढ़ जिले में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने देश के सबसे बड़े रेल-सड़क पुल का आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उद्घाटन करेंगे। मोदी 4.94 किलोमीटर लंबे पुल का डिब्रुगढ़ में फीता काटकर उद्घाटन करेंगे। साथ ही वे पुल की यात्रा करेंगे। इस दौरान पीएम पुल के दूसरे छोर पर स्थित धीमाजी में एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे। इस पुल के पूरा होने में दो दशक से अधिक का समय लगा। बीजी ट्रैक पर डबल लाइन और सड़क के तीन लेन के साथ निर्मित यह पुल देश के अधिकांश पूर्वोत्तर इलाकों के लिए जीवनरेखा होगी। यह असम और अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर और दक्षिण तट के बीच संपर्क में मददगार होगा। बता दें कि यह बोगीबील पुल, असम समझौते का हिस्सा रहा है और इसे 1997-98 में अनुशंसित किया गया था। यह पुल अरूणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा पर रक्षा सेवाओं के लिए भी आड़े वक्त में खास भूमिका निभा सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने 22 जनवरी, 1997 को इस पुल की आधारशिला रखी थी। लेकिन इस पर काम 21 अप्रैल, 2002 को तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय में शुरू हो सका। पुल के शुभारंभ की तारीख का दिन 25 दिसम्बर वाजपेयी की वर्षगांठ का भी दिन है।

इतनी लागत से हुआ तैयार

परियोजना में अत्यधिक देरी के कारण इसकी लागत में 85 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो गई। शुरूआत में इसकी लागत 3230.02 करोड़ रूपये थी जो बढ़कर 5,960 करोड़ रूपये हो गई। इस बीच पुल की लंबाई भी पहले की निर्धारित 4.31 किलोमीटर से बढ़ाकर 4.94 किलोमीटर कर दी गयी। परियोजना के रणनीतिक महत्व को देखते हुये केंद्र सरकार ने इस पुल के निर्माण को 2007 में राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया था। इस कदम के बाद से धन की उपलब्धता बढ़ गई और काम की गति में तेजी आ गई।

पूर्वी क्षेत्र की राष्ट्रीय सुरक्षा को भी बढ़ाएगा

अधिकारियों ने कहा कि यह ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी किनारे पर रहने वाले लोगों को होने वाली असुविधाओं को काफी हद तक कम कर देगा पर इसकी संरचना और इसकी डिजाइन को मंजूरी देते समय रक्षा आवश्यकताओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। एक रक्षा सूत्र ने कहा, ‘यह पुल रक्षा बलों और उनके उपकरणों के तेजी से आवागमन की सुविधा प्रदान करके पूर्वी क्षेत्र की राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ाएगा। इसका निर्माण इस तरह से किया गया था कि आपात स्थिति में एक लड़ाकू विमान भी इस पर उतर सके।’