GI Products : जीआई उत्पादों में धारचूला का दबदबा, दन और थुलमा का नेपाल और चाइना से कैसे बना कनेक्शन

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GI Tag Uttarakhand -  (प्रियदर्शिका नपलच्याल) एक दिन में देश के सर्वाधिक उत्पादों की GI प्रमाण पत्र लेने वाला उत्तराखंड पहला राज्य बन गया है। अब तक उत्तराखंड के 27 उत्पाद जीआई टैग (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) (Geographical Indications) से प्रमाणित हो चुके हैं। हाल में ही मिले उत्तराखंड के 27 उत्पादों को मिले हैं। आज हम बतायेगें उत्तराखण्ड धारचूला के दो उत्पादों के बारे में - 

(रं) भोटिया दन को मिला GI टैग - 
उत्तराखंड की भोटिया जनजाति द्वारा तैयार किए जाने वाले भोटिया दन को जीआई टैग मिला है। इससे इन जातियों के कार्य क्षेत्र में परिवर्तन आएगा। इनके उत्पाद अब उच्च स्तर पर जा सकते हैं। संपूर्ण उत्तराखंड के लिए यह गर्व का विषय है। दन को बनाने के लिये राच में कबास के धागों से शुरू किया जाता है। दन बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के कलर के ऊनी धागों का प्रयोग किया जाता है। यह दन को अब जीआई टैग मिल चुका हैं। यह दन पहले धारचूला की महिलायें अपने व्यवसाय और आजीविका के लिए बनाया करती थी अब बदलते समय के अनुसार लोगों ने इस काम को छोड़ दिया। धारचूला और मुनस्यारी के हस्तशिल्प भोटिया दन को जीआइ टैग (भौगोलिक संकेत) मिलना बड़ी उपलब्धि है। दम तोड़ रहे इस उद्यम और कारोबार के अब फिर से रफ्तार पकड़ने की उम्मीद बढ़ गई है।


 रं बोली में दन को (बयम) बोला जाता है धारचूला में तीनों वैली व्यास, दारमा चैदास तथा मुनस्यारी की महिलायें यह दन बनाती हैं। इस दन को बनाने के लिए महिलायें बड़ी लगन से काम करती हैं। इस दन में नेपाल के 14 जिले के नाम तथा फूल व ड्रैगन का चित्र या आकृति बनायी जाती है। कहा जाता है नेपाल में व्यापार यहीं से होता था इसलिए 14 जिलों के नाम इस प्रकार हैं -1 मेची 2- कोशी 3- सगरमाथा 4-जनकपुर 5- नाराय‌णी 6-बागमती 7-गण्डकी 8- लुम्बिनी 9-धवलागिरी 10- राप्ती 11- भेरी 12- कर्णाली 13 सेती-14- महाकाली इन जिलों में भोटिया दन का निर्यात होता है। यह दन नेपाल में काठमांडू तक भी बेचे जाते हैं। इसके साथ ही पहले चाइना के साथ भी व्यापार होता था। इसीलिए इसमें ड्रैगन का चित्र भी बनाया जाता है। 

 (रं) थुलमा को मिला GI टैग

थुलमा भेड़ की ऊन से बनने वाला विशेष प्रकार का कम्बल है। थुलमा पिटलूम (एक प्रकार का खांचा) में बनाया जाता है। चार हिस्सों में ऊन बुनी जाती है। जिन्हें बाद में आपस में जोड़ा जाता है। धारचूला के थुलमा को स्थानी भाषा में ( पेय , चूटका) इन नामों से जाना जाता है। अभी तक सीमांत में सफेद, काले रंग के ही थुलमे बनते हैं। ऊन की रंगाई नहीं होने के कारण यह दिखने में ज्यादा आकर्षक नहीं होता, लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से यह बेहतरीन है। हीट इंसुलेटर का काम करने वाले एक ही थुलमा शून्य से नीचे तापमान में भी शरीर को खासी गर्मी देता है।

उच्च हिमालयी क्षेत्र में शीतकाल में ठंड से बचाव के लिए इसी का उपयोग होता है। एक थुलमे की कीमत 2200 से 2500 रुपये के बीच होती है। चीन सीमा से लगे धारचूला और मुनस्यारी के हस्तशिल्प थुलमा को जीआइ टैग (भौगोलिक संकेत) मिलना बड़ी उपलब्धि है। दम तोड़ रहे इस उद्यम के अब फिर से रफ्तार पकडऩे की उम्मीद बढ़ गई है। जीआई टैग मिल जाने के बाद अब कारीगरों को इसकी गुणवत्ता के लिए ग्राहकों को सफाई नहीं देनी होगी। ग्लोबल ब्रांड बनने की उम्मीदों के बीच थुलमा चाइनीज कंबलों से मुकाबला कर सकेगा। राज्य की सीमांत तहसील धारचूला और मुनस्यारी के लोग सदियों से हस्तशिल्प के कारोबार से जुड़े हैं। थूलमा को बकरी के ऊन से बनाया जाता हैं।

 

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