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उत्तराखंड के ये स्वादिष्ट व्यंजन, जो दिलाते हैं कैंसर डायबिटीज जैसी कई बीमारियों से निजात, जानिए कैसे करें इस्तेमाल

पहाड़ी व्यंजन स्वाद के साथ-साथ सेहत की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि पहाड़ों के व्यंजन स्वाद के साथ ही कई बीमारियों से भी लडऩे में आपको फायदा पहुंचाते हैं। पहाड़ के बुजुर्ग लोग मोटे अनाज के औषधीय गुणों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, तभी तो मोटा अनाज उनके खान-पान का अहम हिस्सा होता है। काला भट्ट भी ऐसा ही मोटा अनाज है, जिसमें कैंसर जैसी बीमारियों को रोकने के गुण हैं। काला भट्ट प्रोटीन, विटामिन्स, मिनरल्स और फाइबर जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं। डायबिटीज, इंसुलिन रेसिस्टेंट और हाइपोग्लाईसीमिया से जूझ रहे रोगियों के लिए फायदेमंद है।

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जंगली फल गींठी

औषधीय गुणों के बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। ऐसी कोई बीमारी नहीं, जिसे ठीक करने की ताकत गीठीं में ना हो। ये पहाड़ में मिलने वाला कंदमूल फल है, जो कि आमतौर पर जंगलों में मिलता है। औषधीय गुणों के चलते गीठीं की डिमांड बढ़ रही है, यही वजह है कि पहाड़ के कुछ लोग घरों में गीठीं की खेती कर रहे हैं। पहाड़ों में लताऊ, झिंगुर, करी, बाकवा, बोंबा, मकड़ा, शाहरी, बड़ाकू, दूधकू, कुकरेंडा, सियांकू, धधकी, रांय-छांय, कोकड़ो, कंदा, बरना कंदा, दुरु कंदा, बरनाई, खानिया और मीठारू कंदा जैसी कई जड़ी-बूटियां और भी हैं, जिनसे कई बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में आज भी इन जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल कई बीमारियों के इलाज में किया जाता है।

गींठी के बेमिसाल गुण

गीठीं में कई औषधीय गुण हैं, जो कि रोगों से लडऩे में मदद करते हैं। गीठीं का वनस्पतिक नाम नाम है डाइस्कोरिया बल्बीपेरा, ये डाइस्कोरेसी फैमिली का पौधा है। पूरे विश्व में गीठीं की कुल 600 प्रजातियां मिलती हैं। गीठीं के फल बेल में लगते हैं, जो कि गुलाबी, भूरे और हरे रंग के होते हैं। आमतौर पर गीठीं के फल की पैदावार अक्टूबर से नवंबर महीने के दौरान होती है। गीठीं में प्रचुर मात्रा में फाइबर मिलता है, कई जगह इसका इस्तेमाल सब्जी के तौर पर किया जाता है। गीठीं का सेवन डायबिटीज, कैंसर, सांस की बीमारी, पेट दर्द, कुष्ठ रोग और अपच संबंधी समस्याओं में विशेष लाभदायी है। यही नहीं ये पाचन क्रिया को संतुलित करने के साथ ही फेफड़ों की बीमारी, त्वचा रोग और पित्त की थैली में सूजन जैसी समस्याओं में भी बेहद कारगर है।

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अमेरिका में भी बढ़ी भट्ट की डिमांड

पहाड़ों में सोयाबीन यानी भट्ट की खेती होती है और इसकी अलग-अलग तरह की किस्में मिलती हैं। पारंपरिक व्यंजनों में काले भट्ट की दाल को खूब पसंद किया जाता है और इसकी डिमांड भी बहुत है। अमेरिका में भी भट्ट का खूब सेवन किया जाता है। साथ ही काले भट्ट की डिमांड तो बढ़ी है। काले भट्ट से चुडक़ानी, रसभात, दाल, भट्ट के डूबके जैसे कई व्यंजन बनाए जाते हैं। इससे नमकीन भी बनती है। बताया जाता है कि भट्ट में प्रोटीन, विटामिन्स, मिनरल्स और फाइबर जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं।

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इस तरह करें इस्तेमाल

100 ग्राम काले भट्ट में 1500 मिलीग्राम पोटैशियम, 21 ग्राम प्रोटीन और 9 मिलीग्राम सोडियम की मात्रा पाई जाती है। इसमें मौजूद विटामिन-ए, बी-12, डी और कैल्शियम भी सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है। ये एंटी-ऑक्सीडेंट का अच्छा स्त्रोत है। इसमें फाइटो स्ट्रोजनस, डेडजेन और जेनस्टेन पाया जाता है, जो प्रोस्टेट और स्तन कैंसर की रोकथाम में मददगार है। ये कोलेस्ट्रॉल कम करने वाले फाइबर का अच्छा स्रोत है। काला भट्ट डायबिटीज, इंसुलिन रेसिस्टेंट और हाइपोग्लाईसीमिया से जूझ रहे बीमार लोगों के लिए काफी फायदेमंद है।

व्यंजन बनाते समय इन बातों का रखें खास ख्याल

काले भट्ट को पकाने से पहले इस बात का ध्यान रखें कि पकाने से पहले इसे थोड़ी देर के लिए भिगोकर रख दें। क्योंकि इसमें गैस बनाने वाले एंजाइम्स भी होते हैं। पहाड़ों में मिलने वाली काली भट्ट एशिया की मूल प्रजाति है, इसका मूल राष्ट्र चीन माना जाता है। अमेरिका में भी भट्ट का खूब सेवन किया जाता है।

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