अनोख और अद्भुत है 12 कुंभ पर्वों का रहस्य, 4 कुंभ पर्व धरती पर और 8 कुंभ पर्व देवलोक में….

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प्रयागराज-न्यूज टुडे नेटवर्क। हमारे धर्मशास्त्रों के मतानुसार कुंभ 12 कल्पित हैं जिनमें से 4 भारतवर्ष में प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यम्बकेश्वर (नासिक) में होते हैं तथा शेष 8 कुंभ को देवलोक में माना जाता है। कुंभ मेले का आयोजन प्राचीन काल से हो रहा है।

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कुंभ क्या है महत्व

  • कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं। जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है। उन तीन नदियों के नाम है :- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा।
  • कुंभ पर्व के लिए बृहस्पति के राशियों में संक्रमण और उसमें उपस्थिति के आधार पर कुंभ का निर्धारण होता है। इस आधार पर प्रयाग में बृहस्पति का वृषस्थ और सूर्य का मकरस्थ होने पर कुंभ पर्व का योग बनता है, तो उज्जैन में बृहस्पति का सिंहस्थ जिसमें चंद्र-सूर्य का मेषस्थ होने पर कुंभ पर्व का आयोजन किया जाता है। कुंभ राशि के बृहस्पति में जब मेष का सूर्य आता है, तब हरिद्वार में कुंभ का योग बनता है।

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  • कुंभ के आयोजन के लिए सूर्य और चंद्र के साथ बृहस्पति की स्थिति सर्वाधिक महत्व रखती है। इसके साथ ही बृहस्पति का विभिन्न राशियों में संक्रमण का काल मांगलिक माना गया है जिसमें कुंभ का आयोजन किया जाता है। धर्मग्रंथों के आधार पर माना जाता है कि 12 कुंभ पर्व कल्पित हैं जिसमें से 4 प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन व नासिक में होता हैं, तो शेष देवलोक में होते हैं। कुंभ में अर्धकुंभ, सिंहस्थ कुंभ, कुंभ व महाकुंभ मनाया जाता है।
  • कुंभ मेले में देश विदेश से भक्त आते हैं व आस्था की डूबकी पवित्र नदीं में लगाते हैं, कुंभ में पूरे देश के आखाडों के साधु सन्यासी आते हैं। इसके साथ ही हमेशा से कुंभ का सबसे बड़ा आकर्षण माने जाने वाले नागा साधु कुंभ के समय ही दिखाई देते हैं।

कुंभ का पर्व इन चार जगहों पर

1.हरिद्वार में कुंभ : हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है।

2. प्रयाग में कुंभ : प्रयाग कुंभ का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह 12 वर्षो के बाद गंगा, यमुना एवं सरस्वती के संगम पर आयोजित किया जाता है। ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुंभ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब कुंभ मेले का आयोजन प्रयाग में किया जाता है।

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अन्य मान्यता अनुसार मेष राशि के चक्र में बृहस्पति एवं सूर्य और चन्द्र के मकर राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या के दिन कुंभ का पर्व प्रयाग में आयोजित किया जाता है। एक अन्य गणना के अनुसार मकर राशि में सूर्य का एवं वृष राशि में बृहस्पति का प्रवेश होनें पर कुंभ पर्व प्रयाग में आयोजित होता है।

3. नासिक में कुम्भ : 12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुंभ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है। सिंह राशि में बृहस्पति के प्रवेश होने पर कुकुंभ पर्व गोदावरी के तट पर नासिक में होता है। अमावस्या के दिन बृहस्पति, सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में प्रवेश होने पर भी कुंभ पर्व गोदावरी तट पर आयोजित होता है।

4. उज्जैन में कुंभ : सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर यह पर्व उज्जैन में होता है। इसके अलावा कार्तिक अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र के साथ होने पर एवं बृहस्पति के तुला राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुंभ उज्जैन में आयोजित होता है।