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ऐसे शुरू हुआ बूढ़ी दिवाली मनाने का प्रचलन, पढिय़े किन राज्यों में जारी है ये परम्परा

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हर साल दीपावली के बाद बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। बूढ़ी दिवाली खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में मनाई जाती है। हिमाचल और उत्तराखंड के कई गांवों मेंं आज भी बूढ़ी दिवाली मनाने का प्रचलन जारी है। हर साल दीपावली के एक माह बाद बूढ़ी दीवाली मनाई जाती है। हिमाचल के सिरमौर, कुल्लू के बाहरी व भीतरी सिराज क्षेत्र शिमला के ऊपरी इलाके व किन्नौर व उत्तराखंड के कुमाऊं-गढ़वाल के कई पहाड़ी जिलों मेंं दीपावली से एक माह बाद यह पर्व इस बार सात दिसंबर को आरंभ होगा।

इसलिए मनाते है बूढ़ी दीवाली

कहा जाता है कि बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा महाभारत व रामायण युग से निकली हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में श्रीराम के अयोध्या लौटने की खबर देर से पहुंची तब तक पूरा देश दीवाली मना चुका था फिर भी पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले लोगों ने उत्सव मनाया। जिसका नाम बाद में बूढ़ी दीवाली पड़ गया। वही हिमाचल के जिला कुल्लू का निरमंड पहाड़ी काशी से रूप में प्रसिद्ध है। यह जगह भगवान परशुराम ने बसाई थी, वे अपने शिष्यों के साथ भ्रमण कर रहे थे। एक दैत्य ने सर्पवेश में उन पर आक्रमण किया तो परशुराम ने अपने परसे से उसे खत्म किया। इस पर लोगों द्वारा खुशी मनाना स्वाभाविक था जो आज तक जारी है। इस मौके पर यहां महाभारत युद्ध के प्रतीक रूप युद्ध के दृश्य अभिनीत किए जाते हैं।

उत्तराखंड में 11 दिन बाद मनाते है इगास

उत्तराखंड के टिहरी जिले के जौनपुर, उत्तरकाशी के गोडर खाटर, रवाईं घाटी और देहरादून के जौनसार बाबर में बूढ़ी दीपावली, बग्वाली या पुरानी दीपावली के नाम से मनाया जाने वाला जनजातीय पर्व असक्या पर्व के साथ शुरू हो गया है। दीपावली के ठीक 30 दिनों के बाद प्रदेश के जौनपुर, रवाईं और जौनसार बावर क्षेत्र में मनाए जाने वाली पहाडों की मुख्य बूढ़ी दीपावली असक्या पर्व के साथ शुरू हो गई है। इसमें पहाड़ी उत्पाद झंगोरे से बने असके का दही के साथ सेवन किया जाता है। दीपावली के 11 दिन बाद गढ़वाल में इसे मनाया जाता है। इसे इगास बग्वाल यानी दीपावली कहा जाता है। प्रचलित कथा के अनुसार गढ़वाल में प्रभु राम के अयोध्या लौटने की सूचना 11 दिन बाद मिली थी। इसके बाद खुशी में लोगों ने भैलो खेला था।

 

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