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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी -आखिर क्यों भगवान श्रीकृष्ण धारण करते थे मोरपंख का मुकुट, जानिए क्या छुपा है राज

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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी – भगवान श्री कृष्ण का नाम मुंह में आते ही हमारे आँखो के सामने उनके सुन्दर बाल छवि या उनके युवा छवि का चेहरा समाने आ जाता है। भगवान श्री कृष्ण के हर छवि में उनके मष्तक पर मोर पंख शोभायमान होता है। भगवान श्री कृष्ण को मोर पंख इतना पसंद था की वह उनके श्रृंगार का हिस्सा बन गया था। सारे देवताओं में सबसे ज्यादा श्रृंगार प्रिय हैं भगवान श्रीकृष्ण। कई बार मन में सवाल उठता है कि तरह-तरह के आभूषण पहनने वाले श्रीकृष्ण मोर-मुकुट क्यों धारण करते हैं? उनके मुकुट में हमेशा मोर पंख क्यों लगाया जाता है ?

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इसका पहला कारण तो यह है कि मोर ही अकेला एक ऐसा प्राणी है, जो ब्रह्मचर्य को धारण करता है, जब मोर प्रसन्न होता है तो वह अपने पंखो को फैला कर नाचता है। और जब नाचते-नाचते मस्त हो जाता है, तो उसकी आंखों से आंसू गिरते है और मोरनी इन आँसू को पीती है और इससे ही गर्भ धारण करती है, मोर में कहीं भी वासना का लेश भी नही है,और जिसके जीवन में वासना नहीं, भगवान उसे अपने शीश पर धारण कर लेते है।

 

भगवान कृष्ण के जीवन से सीखें प्रेम के पाठ

मोर पंख श्री कृष्ण को इतना प्रिय है कि वह उनके श्रृंगार का एक अहम हिस्सा है। इसीलिए श्री कृष्ण को मोर्मुकुत धारी के नाम से भी बुलाया जाता है। मोर का पंख कृष्ण हमेशा अपने मुकुट पर धारण करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों है कि कृष्ण मोर के पंख से इतना प्रेम करते हैं। आज हम ऐसी ही कुछ कहानियों और कथाओं के बारे में जानेंगे कि आखिर क्यों कृष्ण को मोर पंख प्रिये है?

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श्रीकृष्ण और मोर का नृत्य

एक बार कृष्ण अपने दोस्तों के साथ जंगल में सो रहे थे। तभी कृष्ण की आँख खुली और देखा की मौसम बहुत अच्छा है। यह देख कर उन्हों ने बांसुरी बजाना शुरू कर दिया। जिसके संगीत से सारे पशु पक्षी नाचने लगे। उनमें कुछ मोर भी थे जो नाच रहे थे। जब संगीत खत्म हुआ तो मोरों के राजा कृष्ण के पास गए और अपने पंख तोडक़र जमीन पर गिरा दिए। इन पंखों को उन्होंने कृष्ण को गुरुदक्षिणा के रूप में दिए। जिसे कृष्ण ने खुशी खुशी स्वीकार कर लिया और कहा कि इसे कृष्ण अपने बालों पर सजा लें। इस पर कृष्ण ने कहा कि वे हमेशा यह पंख अपने मुकुट पर पहनेगें।

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राधारानी के प्रेम की धरोहर

माना जाता है कि राधाजी के महल में बहुत से मोर हुआ करते थे। कृष्ण की बांसुरी पर जब राधाजी नृत्य करती थीं तो मोर भी कृष्णभक्ति में उनके साथ झूमने लगते थे। ऐसे ही मोर का एक बार पंख नृत्य के वक्त जमीन पर गिर गिया। जब भगवान कृष्ण ने इसे राधाजी के प्रेम के प्रतीक के रूप में अपने मुकुट में धारण कर लिया।

मोर पंख में सात रंग

वास्तव में श्रीकृष्ण का मोर मुकुट कई बातों का प्रतिनिधित्व करता है, यह कई तरह के संकेत हमारे जीवन में लाता है। मोर के पंखों से भगवान कृष्ण यह संदेश देना चाहते हैं कि हमारा जीवन भी इसी तरह सभी रंगों से भरा है। कभी इसमें चमक आती है तो कभी ये हल्का पड़ जाता है। जीवन में भी इन्हीं रंगों की भांति सुख और दुख बने रहते हैं। ये है श्रीकृष्ण के मोर पंख से जुडी कथा। बस इसी कारण श्रीकृष्ण अपने श्रृंगार में सदा मोर पंख का प्रयोग करते हैं।

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स्कंद के शुभेच्छु

भगवान विष्णु और देवी पार्वती का भाई बहन का रिश्ता है, क्योंकि विष्णु ने देवी पार्वती से शिव की शादी करने के लिए मनाया था। इसीलिए कृष्ण कार्तिकेय के मामा हुए, और कार्तिकेय मोर की सवारी करते हैं। यही कारण है कि कृष्ण अपने मुकुट पर मोर पंख धारण करते हैं जिससे उनके भतीजा की सारी मनोकामना पूरी हो और वो युद्ध के राजा कहलाएं।

श्री राम और मोर

भगवान श्री राम का जन्म जब त्रेता युग में हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान श्री राम एक बार घूमने निकलें तो मोर के एक समूह ने पंखों से उनका रास्ता साफ किया था। मोरों की इतनी निर्दयता और भक्ति को देखकर श्री राम ने मोरों से वादा किया कि द्वापर युग में जब वे फिर से जन्म लेंगे तो यह मोर पंख वे अपने मस्तक पर धारण करेंगे। इसीलिए जब कृष्ण ने द्वापर युग में जन्म लिया तो मोर पंख को अपने मुकुट पर सजाया और अपना वादा पूरा किया।

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सुख और दुख का प्रतीक

मोरपंख में सभी रंग पाए जाते हैं। इसी प्रकार हमारा जीवन भी सभी प्रकार के रंगों से भरा है। कभी सुख तो कभी दुख, कभी धूप तो कभी छांव। मनुष्य को जीवन के सभी रंगों को प्रेम से अपनाना चाहिए।