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श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर जो साल में एक दिन 24 घंटे के लिए नागपंचमी के दिन खुलता है, ये मंदिर है अद्भुत

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मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित भगवान नागचन्द्रेश्वर का मंदिर साल में एक ही दिन 24 घंटे के लिए खुलता है। देश में यह एक मात्र भगवान नागचंदेश्वर का मंदिर है जिसके पट नागपंचमी के एक दिन पहले 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं। यह मंदिर बहुत ही पुराना है, मान्यता के अनुसार परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी में इस मंदिर का निर्माण करवाया। नागचंद्रेश्वर मंदिर जो पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान विष्णु की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं। मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं। खास बात यह है कि यह मंदिर साल में सिर्फ एक दिन नागपंचमी (श्रावण शुक्ल पंचमी) पर ही दर्शनों के लिए खोला जाता है। ऐसी मान्यता है कि नागराज तक्षक स्वयं मंदिर में रहते हैं। जो महाकाल की नगरी उज्जैन में स्थित हैं।

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दशमुखी सर्प शय्या पर विराजमान हैं भगवान भोलेनाथ

नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं. कहते हैं यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी। उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है. पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं. मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं। शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं।

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क्या है पौराणिक मान्यता

इस मंदिर के बारें में मान्यता है कि सर्पो के राजा तक्षक ने भगवान भोलेनाथ की यहां पर घनघोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से भगवान शिव नें प्रसन्न होकर तक्षक को अमरत्व का वरदान दिया। इसके बाद से माना जाता है कि तक्षक नाग इसी मंदिर में विराजित है। वह भगवान शिव के गलें हाथ-पैर में एक नाग के रुप में लिपटे हुए है। जिस पर शिव और उनका परिवार आसीन है। एकादशमुखी नाग सिंहासन पर बैठे भगवान शिव के हाथ-पांव और गले में सर्प लिपटे हुए है। मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है।

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हर वर्ष करीब 2 लाख से ज्यादा भक्त करते हैं नागदेवता के दर्शन

यह मंदिर काफी प्राचीन है। माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था. इसके बाद सिंधिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था. उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था। सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए. लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं।
जब एक दिन के लिए नागपंचमी के दिन इस मंदिर के पट खुलते हैं तो नागचंदेश्वर के दर्शन के लिए देसी-विदेशी पर्यटकों का तांता लग जाता है। हजारों की संख्या में भक्त भगवान के दर्शन के लिए यहां आते हैं।