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पितृपक्ष -13 सितंबर से , जानिए श्राद्ध पिंडदान व तर्पण के नियम और महत्वपूर्ण तिथियां

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पितृपक्ष – पितरों को प्रसन्न कर लिया जाए तो घर परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है। इस बार पितृपक्ष 13 सितंबर शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से 28 सितंबर तक हैं। 14 सितम्बर की सुबह 8 बजकर 42 मिनट से अश्विन प्रतिपदा की शुरूआत होगी इस दिन से प्रतिपदा का श्राद्ध व तर्पण शुरू होगा। पितृपक्ष अपने पितरों को याद करने का विशेष समय माना गया है। इन दिनों में पितरों के नाम से श्राद्ध पिंडदान करना चाहिए मान्यता है कि ऐसा नहीं करने से पितृ दोष लगता है। शास्त्रों के अनुसार तीन ऐसी जगह हैं जहां पिंडदान करने के लिए सबसे विशेष माना गया है। इनमें से बदरीनाथ अहम है। इसके अलावा हरिद्वार में नारायणी शीला के पास लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं। वहीं, तीसरी अहम जगह गया , जो बिहार में जिले में है, जहां देश-विदेश से लोग पिंडदान करने के लिए आते हैं।

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पितृ पक्ष का महत्व

हमारे ग्रंथों में बताया गया है कि भगवान की पूजा से पहले अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिये। यदि पितर प्रसन्न हो गए तो समझिये देवता भी प्रसन्न हो गए। यही कारण है कि भारत के हर घर में बड़े बुजुर्गों का सम्मान किया जाता है और उनके इस दुनिया से चले जाने के बाद उनका श्राद्ध कर्म किया जाता है। इसके पिछे यह मान्यता भी है कि यदि विधिनुसार पितरों का तर्पण न किया जाये तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्युलोक में भटकती रहती है। शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि जिनका देहांत हो चुका है और वे सभी इन दिनों में अपने सूक्ष्म रुप के साथ धरती पर आते हैं और अपने परिजनों का तर्पण स्वीकार करते हैं।

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वर्ष 2019 की श्राद्ध की तिथियां

  • 13 सितंबर- शुक्रवार, पूर्णिमा श्राद्ध
  • 14 सितंबर- शनिवार, प्रतिपदा
  • 15 सितंबर- रविवार, द्वितीया
  • 16 सितंबर- सोमवार,तृतीया
  • 17 सितंबर- मंगलवार, चतुर्थी
  • 18 सितंबर- बुधवार, पंचमी, महा भरणी
  • 19 सितंबर- गुरुवार, षष्ठी
  • 20 अक्टूबर- शुक्रवार, सप्तमी
  • 21 अक्टूबर- शनिवार, अष्टमी
  • 22 अक्टूबर- रविवार, नवमी
  • 23 अक्टूबर- सोमवार, दशमी
  • 24 अक्टूबर- मंगलवार, एकादशी
  • 25 अक्टूबर- बुधवार, द्वादशी
  • 26 अक्टूबर- गुरुवार, त्रयोदशी
  • 27 चतुर्दशी- शुक्रवार, मघा श्राद्ध
  • 28 अक्टूबर- शनिवार, सर्वपित्र अमावस्या

किसे करना चाहिए श्राद्ध

वैसे तो श्राद्ध का अधिकार पुत्र को प्राप्त है, लेकिन अगर पुत्र नहीं है तो पौत्र, प्रपौत्र या फिर विधवा पत्नी भी श्राद्ध कर सकती है। वहीं पत्नी का श्राद्ध पुत्र के ना होने पर पति कर सकता है। मार्कण्डेयपुराण में बताया गया है कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होता है, उसमें दीर्घायु, नीरोग व वीर संतान जन्म नहीं लेती है और परिवार में कभी मंगल नहीं होता है।

ऐसे करें श्राद्ध

पितृपक्ष में प्रत्येक दिन स्नान करें और इसके बाद पितरों को जल, अर्घ्य दें। इस दौरान तिल, कुश और जौ को जरूर रखें। इसके साथ ही जो श्राद्ध तिथि हो उस दिन पितरों के लिए पिंडदान और तर्पण करें। इस दिन घर में उस शख्स की पसंदीदा भोजन बनवाए। इसके बाद पहले गाय, कौवा-पक्षी और कुत्ते को भोजन निकाल दें। सारे व्यंजन में से थोड़ा-थोड़ा निकालकर एक पात्र में लेकर उसे किसी सडक़, चौराहे पर रख दें। तथा ब्राह्मणों को भोजन अवश्य कराएं।

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धन के अभाव में करें पितरों ये प्रार्थना

कुछ लोग आर्थिक दृष्टि से समृद्ध नहीं होते हैं और श्राद्ध परंपरा अनुसार नहीं कर पाते हैं। शास्त्रों में उनके लिए भी समाधान है। एक सच्ची प्रार्थना, आपके पितरों को तृप्त कर सकती है। ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि धन के अभाव में श्रद्धापूर्वक केवल शाक से भी श्राद्ध किया जा सकता है। यदि इतना भी न हो तो अपनी दोनों भुजाओं को उठाकर कह देना चाहिए कि मेरे पास श्राद्ध के लिए न धन है और न ही कोई वस्तु। अत: मैं अपने पितरों को प्रणाम करता हूं, वे मेरी भक्ति से ही तृप्त हों।

इस मंत्र का करें जाप

किसी बर्तन में दूध, जल, तिल, पुष्प लें। अब हाथ में कुश लें और तिल के साथ तर्पण करें। इस दौरान ‘ ऊँ पितृदेवताभ्यो नम:’ का जाप करें।

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किस तिथि को करें श्राद्ध

यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। जिस तिथि में आपके पूर्वज का देहावसान हुआ है उसी तिथि में श्राद्ध करना चाहिए। यदि आपको तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश उस तिथि को श्राद्ध नहीं कर पाते हैं तो पितृ अमावस्या, जिसे पितृ विसर्जन भी कहते हैं, को श्राद्ध कर सकते हैं। इसे सर्व पितृ श्राद्ध तिथि या योग भी कहा जाता है। महिलाओं के लिए मातामही श्राद्ध अर्थात नवमी तिथि अधिक महत्वपूर्ण है।

पितृ पक्ष में इन बातों का रखे विशेष ध्यान

1- बाल न कटवाएं – 2- किसी भिखारी को घर से खाली हाथ न लौटाएं- 3- लोहे के बर्तन का इस्तेमाल न करें- 4- नया समान न खरीदें- 5- दूसरे का दिया अन्न न खाएं