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कविता-मेरा वजूद

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क्या है वजूद तेरा मेरे बिना??
हैरान हूं मैं, क्या सिवा मेरे किसी और ने भी ताउम्र, ये तंज सुना??


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मेरे वजूद को यू ताक़ पर रखने वाले,
तुझसे बस इतना विनय है मेरा,
तु झाँक अंदर अपने और पूछ बस एक सवाल,
गर ना होती स्त्री जगत में ,
आंचल मां का ना मिलने पर होता तुझे भी मलाल।

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जो रखे, कोख में अपनी तुझे,
हर सपना तुझे अपना अंश मानकर संजौती है,
क्या इस संसार में ,स्त्री से बड़ी कोई त्याग की देवी होती है??

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कभी बहन कभी पत्नी और कभी मां,
हर स्वरूप में बलिदान की आशा, क्यों इन्हीं से होती है??
पर अंदर- ही-अंदर इस बोझ के तले घुटन-सी,
शायद इन्हें भी होती है।

जहां और जब भी मौका मिला,
खुद को साबित करके दिखलाया है,
पर फिर क्यों दोबारा वही सवाल–मेरे बिना वजूद क्या है तेरा ?? ताउम्र यही जतलाया है।

परिवार की खातिर,
सिसकियां कब चुप्पी में तब्दील हो जाती हैं??
रख ताक़ पर अपने सपनों को हमेशा,
दूसरों के लिए जिए जाती हैं।।

कहता है जमाना, वक्त अब बदल गया,
बेशक! इसमें कोई दो राय नहीं,
काश!इस बदलते वक्त के साथ वह नजरिया भी बदल जाए।

युग-युगांतर से साक्षी हैं,
यह नभ- सूरज -चांद और सितारे,
युग-युगांतर से साक्षी हैं,
यह नभ- सूरज-चांद और सितारे ।

वजूद मेरा नहीं अपितु, वजूद तेरा नहीं बिना मेरे
वजूद मेरा नहीं अपितु, वजूद तेरा नहीं बिना मेरे।।

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