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कुरुक्षेत्र -Kurukshetra जहां लड़ा गया था महाभारत युद्ध, जानिए यहां के प्रमुख घूमने लायक दर्शनीय स्थल

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कुरुक्षेत्र- हिंदू पौराणिक कथाओं में गहराई से जुड़ा कुरूक्षेत्र भारत के हरियाणा राज्य का एक प्राचीन शहर है। भारत के कई राजवंश इस ऐतिहासिक भूमि पर सम्मानपूर्वक राज कर चुके हैं। मौर्य साम्राज्य के दौरान कुरुक्षेत्र एक अध्यन केंद्र के रूप में भी उभरा था। श्रीमद्भागवत गीता का जन्मस्थान कुरूक्षेत्र मुख्य रूप में भारत के सबसे ऐतिहासिक युद्ध महाभारत के लिए जाना जाता है, ये वो महायुद्ध था जो एक ही वंश के दो शक्तिशाली परिवारों (कौरवो और पांडवो) के मध्य लड़ा गया था। अपने पौराणिक महत्व के कारण यह भूमि पूरे विश्व में जानी जाती है। वर्तमान में कुरूक्षेत्र हरियाणा राज्य का एक जिला है। कुरुक्षेत्र दर्शन भारत की राजधानी दिल्ली से लगभग 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। आइए इस खास लेख के माध्यम से जानते हैं यह प्राचीन शहर आपको किस प्रकार आनंदित कर सकता है।

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कुरुक्षेत्र का इतिहास (History Of Kurukshetra)

महाभारत का युद्ध हुए यूं तो बरसों बीत चुकें हैं, लेकिन आज भी लोगों में इसके प्रति जिज्ञासा है. कब और कहाँ हुआ था यह युद्ध? महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था जिसका नाम राजा कुरु के नाम पर पड़ा था। यह स्थान आज भारत के हरियाणा राज्य में है। कुरुक्षेत्र में महाभारत के युद्ध होने के पीछे भी एक कारण है जिसके अनुसार देवराज इंद्र ने राजा कुरु को यह वरदान दिया था कि जो भी कोई इस स्थान पर युद्ध करता हुआ मारा जायेगा तो उसे स्वर्ग प्राप्त होगा ।इसीलिए महाभारत के युद्ध के लिए इस स्थान को चुना गया था। महाभारत का युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच धर्म की स्थापना के लिए हुआ था जिसमे पांडवों की जीत हुई थी। 18 दिन चला महाभारत के इस युद्ध में पांडवों ने श्रीकृष्ण के साथ मिलकर कौरवों को हराया था. इस युद्ध के साथ ही अधर्म पर धर्म की गौरवपूर्ण विजय हुई थी।

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कुरुक्षेत्र के दर्शनीय और पर्यटन स्थल (Kurukshetra Of Turism Places)

कुरुक्षेत्र एक पवित्र भूमि हैं जोकि भारत वर्ष के इतिहास से जुडी हैं। इस स्थान से कई कहानियां जुडी हुई हैं और वेदों में इसका उल्लेख किया गया हैं। रहस्यमय कहानियों और लोक कथाओं से सम्बंधित कुरुक्षेत्र हिंदू धर्म के लोगों के लिए धार्मिक महत्व के स्थानों में से एक माना जाता है। महाभारत से सम्बंधित कुरुक्षेत्र के दर्शनीय स्थलों में यहां कई जगह ऐसी हैं जिनकी यात्रा करके आप एक अलग ही अनुभव प्राप्त करेंगे।

ब्रह्मसरोवर झील

ब्रह्म सरोवर, जैसा कि नाम से पता चलता है, ब्रह्मांड के निर्माता भगवान ब्रह्मा से जुड़ा हुआ है। सौर ग्रहण के दौरान सरवर के पवित्र पानी में डुबकी लेना हजारों अश्वमेधा यज्ञों के प्रदर्शन की योग्यता के बराबर माना जाता है। स्थानीय परंपरा के मुताबिक महाभारत युद्ध में उनकी जीत के प्रतीक के रूप में सरवर के बीच में स्थित द्वीप में युधिष्ठार द्वारा एक टावर बनाया गया था। उसी द्वीप परिसर में एक प्राचीन द्रौपदी कुप है। सरवर के उत्तरी तट पर स्थित भगवान शिव के मंदिर को सर्वेश्वर महादेव कहा जाता है। कहा जाता है कि इसी सरोवर के तट पर कर्ण ने अपने कवच कुंडल ब्राह्रमणों को दान किए थे। परंपरा के अनुसार, यहां भगवान ब्रह्मा द्वारा शिव लिंग स्थापित किया गया था। नवंबर-दिसंबर में ब्रैमरोवर के तट पर वार्षिक गीता जयंती समारोह आयोजित किया जाता है।

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ज्योतिसर – गीता का जन्मस्थान

ज्योतिसर वह जगह है जहां गीता का जन्म स्थान पवित्र ज्योतिसर कुरुक्षेत्र का सबसे सम्मानित तीर्थ है। ऐसा माना जाता है कि महाभारत युद्ध ज्योतिसर से शुरू हुआ, जहां युद्ध की पूर्व संध्या पर अर्जुन को गीता के शासक भगवान कृष्ण से अनन्त संदेश मिला। जहां महाभारत युद्ध के दौरान भगवान श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश देने के उपरांत अर्जुन को अपने दिव्य स्वरुप का दर्शन कराया था। ज्योतिसर में स्थित बरगद के पेड़ को वही पेड़ माना जाता है जो गीता के उपदेश का गवाह बना था। श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को आकाशीय गीता का उपदेश देते हुए संगमरमर के रथ पर एक विशाल मूर्ति बनी हुई हैं। ऐसा कहा जाता है कि आदि शंकरचार्य ने ईसाई युग की 9वीं शताब्दी में हिमालय के रहने के दौरान इस स्थान की पहचान की है।

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भीष्म कुंड

यह लघु जलाशय अपने भीतर विशाल किवदंतियां समेटे हुए है। यह वही कथाएं हैं जिनके विषय में आपने अनेक बार देखा व पढ़ा होगा। महाभारत युद्ध के समय भीष्म अर्जुन के बाणों द्वारा घायल होकर पृथ्वी की ओर गिरे थे तथा वेधित बाणों की सेज पर लेट गए थे। प्यास से व्याकुल भीष्म की तृष्णा शांत करने के लिए अर्जुन ने यहीं पृथ्वी पर बाण छोड़कर जल स्त्रोत उत्पन्न किया था। महाभारत युद्ध के समापन के पश्चात युधिष्ठिर ने यहाँ वापिस आकर शर-शैया पर लेटे भीष्म पितामह से राज धर्म की शिक्षा प्राप्त की थी। भीष्म की प्यास बुझाने के लिए अर्जुन धरती माता की गोद से तीर मार कर गंगा जल प्रकट किया और भीष्म की प्यास बुझाई।

स्थानेश्वर महादेव मन्दिर

कुरुक्षेत्र का दर्शनीय स्थानेश्वर महादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं। माना जाता है कि स्थानेश्वर महादेव मंदिर यात्रा किए बिना कुरुक्षेत्र की यात्रा अधूरी मानी जाती हैं। यह प्राचीन दर्शनीय मंदिर कुरुक्षेत्र आने वाले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता हैं। कहा जाता था। उनके अनुसार ब्रम्हाजी ने स्वयं यहाँ शिवलिंग की स्थापना की थी।

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सन्निहित सरोवर कुरुक्षेत्र

सन्निहित सरोवर कुरुक्षेत्र भगवान विष्णु का स्थायी निवास माना जाता है, सन्निहित सरोवर पेहेवा रोड पर कुरुक्षेत्र से 3 किमी की दूरी पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि तीर्थों की पूरी श्रृंखला यहां अमावस्या के दिन इक_ा होती है, यदि कोई व्यक्ति सौर ग्रहण के समय श्राद्ध करता है और इस टैंक में स्नान करता है, तो वह 1000 अश्वमेघ यज्ञ के फल प्राप्त करता है। सूर्य ग्रहण के समय, तीर्थयात्री इस पवित्र स्थान पर इक_े होते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस जगह के आगंतुक पुरोहितों से स्थानीय रूप से जाने जाते हैं या स्थानीय रूप से पांडों के नाम से जाने जाते हैं, जो देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले तीर्थयात्रियों के रिकॉर्ड रखने वाले हैं। सिख गुरु भी समय-समय पर इस पवित्र स्थान पर गए हैं।

शेख चिल्ली मकबरा

कुरुक्षेत्र सिर्फ महाभारत, शक्तिपीठ और दूसरे हिंदू धर्मस्थलों के लिए ही नहीं, शेख चेहली के मकबरे के लिए भी प्रसिद्ध है। देश के प्रमुख राष्ट्रीय स्मारकों में शुमार इस मकबरे को हरियाणा का ताजमहल भी कहा जाता है। राजधानी दिल्ली से अमृतसर के बीच इसके अलावा कोई भी ऐसा स्मारक नहीं है, जिसमें शाहजहां के समकालीन संगमरमर का प्रयोग किया गया हो। प्रसिद्ध सूफी संत शेख चेहली की याद में दाराशिकोह ने लगभग 1650 ई. में इसे बनवाया था। यह मकबरा दाराशिकोह के पठन-पाठन और आध्यात्मिक ज्ञान का भौतिक प्रतीक था। मकबरे की स्थापत्य कला बेजोड़ है, जो हर्ष के टीले के नाम से विख्यात प्राचीन टीले के पूर्वी किनारे पर स्थित है।

राजा हर्ष का टीला

राजा हर्ष का टीला, कुरूक्षेत्र शहर के बाहरी इलाके में 1 किमी. की लम्‍बाई में 750 मीटर की चौड़ाई तक फैला हुआ है। यह पुराना ऐतिहासिक टीला, 15 – 18 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है जहां से जमीन के अंदर से अमूल्‍य संपदा प्राप्‍त होती है जो यहां का ऐतिहासिक अवशेष है। राजा हर्ष का टीला पुरातात्विक महत्व का है और इससे प्राप्त होने वाली वस्तुएं कुषाण काल के प्रारंभ से मुगल काल तक की सभ्यताओं का एक विशिष्ट क्रम प्रदर्शित करती हैं।

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भद्रकाली मंदिर में उमड़ी भक्तों की भीड़

माना जाता है कि कुरुक्षेत्र में शक्तिपीठ श्री देविकूप भद्रकाली मंदिर में माता सती के दाहिने घुटने गिर गए। पौराणिक कथाओं में यह है कि महाभारत की लड़ाई के लिए आगे बढ़ने से पहले, भगवान कृष्ण के साथ पांडवों ने यहां उनकी पूजा के लिए प्रार्थना की और अपने रथों के घोड़ों को दान दिया, जिसने इसे चांदी, मिट्टी से बने घोड़ों की पेशकश करने की पुरानी परंपरा बना दी आदि, इच्छा के पूरा होने के बाद, किसी के माध्यमों के आधार पर। इस कृतिपीठ श्री देविकूप भद्रकाली मंदिर में श्रीकृष्ण और बलराम का टोंसूर (हेड शेविंग) समारोह भी किया गया था।

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पैनोरमा और विज्ञान केंद्र

कुरुक्षेत्र पैनोरमा एंड साइंस सेंटर एक सुंदर बेलनाकार इमारत है जिसका प्रयोग आगंतुकों की गतिविधियों के लिए प्रदर्शनियों और कामकाजी मॉडल के लिए किया जाता है। कुरुक्षेत्र पैनोरमा और विज्ञान केंद्र में जमीन के तल में और बेलनाकार दीवारों के साथ पहली मंजिल में दो अलग-अलग प्रकार के प्रदर्शन होते हैं। कुरुक्षेत्र पैनोरमा और विज्ञान केंद्र कुरुक्षेत्र के प्रमुख आकर्षणों में से एक है जोकि महाभारत की घटनाओं और विज्ञान के रहस्यों के बारे में विस्तृत जानकारी को एकत्रित किए हुए हैं। कुरुक्षेत्र के मुख्य रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किलोमीटर के दायरे में स्थित इस विज्ञान केंद्र में कई प्रदर्शनी देखने को मिलती हैं। संग्रहालय में में बच्चो के लिए कुछ विशेष क्षेत्र है। सप्ताह के किसी भी दिन आप सुबह 10 बजे से शाम 5:30 बजे तक यहाँ घूमने जा सकते हैं।

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श्रीकृष्ण संग्रहालय

यह संग्रहालय, भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है जिसे कुरूक्षेत्र विकास प्राधिकरण के द्वारा 1987 में बनवाया गया था। कुरुक्षेत्र में पैनोरमा और विज्ञान केंद्र के पास स्थित श्रीकृष्ण संग्रहालय भारतीय पौराणिक कथाओं और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए एक आदर्श स्थान है। इस संग्रहालय में भगवान श्री कृष्ण के बारे में समस्त जानकारियां प्रदान की जाती है। उनके सभी स्वरूपों, अवतारों, कार्यो, आदि के बारे में बताया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को एक दार्शनिक, सच्चे धार्मिक नेता और प्रेमी के रूप में भी कलाकृतियों, मूर्तियों, चित्रों, शिलालेखों आदि के द्वारा दर्शाया गया है।

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कोस मीनार

धार्मिक स्थलों के अलावा आप यहां के ऐतिहासिक स्थलो की सैर का भी प्लान बना सकते हैं। कोस मीनार मध्ययुगीन मील का पत्थर हैं जो कुरुक्षेत्र के विभिन्न कस्बों में मौजूद हैं। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि इन मीनारों का इस्तेमाल मुगल साम्राज्य के दौरान सड़कों की दूरी को चिह्नित करने के लिए किया जाता था। आज भी आप हरियाणा में ऐसी मीनारों को देख सकते हैं, वर्तमान समय में हरियाणा में 49 ऐसी कोस मीनारें सुरक्षित हैं, जिनमें से कुछ को कुरूक्षेत्र यात्रा के दौरान देखा जा सकता है। भारतीय इतिहास के कुछ पहलुओं को आप इन मीनारों के माध्यम से समझ सकते हैं।

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कुरुक्षेत्र सिटी में खाने के लिए का स्थानीय भोजन

कुरुक्षेत्र समृद्ध और विस्तृत हरियाणवी भोजन के लिए जाना जाता हैं। यहाँ के भोजन में मुख्य रूप से बाजरे, गेहूं, मकई की रोटी प्रसिद्ध हैं। इनके साथ-साथ अन्य व्यंजनों में सिंगरी की सब्जी, मिश्रित दाल, छोलिया, कढ़ी पकोड़ा और विशिष्ट उत्तर-भारतीय भोजन मिलता हैं। कुरुक्षेत्र के अन्य प्रसिद्ध भोजन में स्वादिष्ट खीर, मालपुए, चूरमा और आलू की रोटी, दाल मखनी, पनीर अमृतसरी, कुल्चा, चन्ना-भटूरा, राजमा और बहुत कुछ शामिल है।

कैसे पहुंचे – दिल्ली से कुरुक्षेत्र की दूरी 156 किलोमीटर है। कुरुक्षेत्र के लिए दिल्ली से बसें 24 घंटे मिलती रहती हैं। दिल्ली अंबाला मार्ग पर चलने वाली रेलगाडय़िों से भी यहां पहुंच सकते हैं। यहां अंबाला की ओर जाने वाली बसों से आप पिपली में उतरें। पिपली से आप सीधा आटो करके पहुंचे ब्रह्म सरोवर। यह कुरुक्षेत्र का मुख्य आकर्षण है। कुरुक्षेत्र जाने के लिए बस या टैक्सी भी एक आदर्श साधन हैं। सरोवर को केंद्र बनाकर आप आसपास के प्रमुख स्थलों को घूम सकते हैं। कुरुक्षेत्र के दर्शन के लिए सितंबर से मार्च के महीने की अवधि सबसे आदर्श मानी जाती हैं। क्योंकि इस समय के दौरान मौसम ठंडा और सुखद रहता हैं