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उत्तराखंड के धधकते जंगलों में अब तक कितना हुआ नुकसान, आंकड़े देखकर चौंक जाएंगे आप

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देहरादून : उत्तराखंड के जंगल खूबसूरती, शीतलता और हरियाली के लिए जाने जाते हैं। मगर साल दर साल गर्मी का पारा चढ़ते ही ये जंगल धधकने लगते हैं। जिससे इनका वजूद संकट में है। इस साल उत्तराखण्ड के हजारों हेक्टेयर जंगल जलकर स्वाहा हो गए। सिर्फ जंगल ही नहीं वन्य जीव, वानिकी, पारिस्थितिकी भी खतरे में है। वन आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले कई दिनों में कुमाऊं में तबाही के बाद अब गढ़वाल क्षेत्र में वनाग्नि ने जोर पकड़ लिया है। आंकड़ों के मुताबिक सोमवार सुबह से चौबीस घंटे में पूरे राज्य में 107 जगहों पर जंगलों में लगी आग ने तबाही मचायी है।

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कई जगह हुआ नुकसान

जानकारी के अनुसार गढ़वाल मंडल में ही 79 जगहों पर लगी आग से भारी नुकसान हुआ। जबकि कुमाऊं में स्थिति को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया है और पिछले चौबीस घंटे के भीतर क्षेत्र में आग लगने की कुल 20 घटनाएं हुई। इसके अलावा राज्य के वन्यजीव अभ्यारण्यों में भी आठ जगहों पर आग लगने की घटनाएं हुईं।

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अब तक हुआ इतना नुकसान

पिछले कुछ दिनों से पर्वतीय इलाकों में हुई बारिश से थोड़ी बहोत राहत मिल गई है। वहां एक दिन पूर्व आग ने जमकर तबाही मचायी थी। अब तक हुई कुल 46 घटनाओं में छह वन्यजीवों की मौत हो चुकी है। वन आपदा प्रबंधन विभाग के अफसरों के मुताबिक आग से अब 1044.035 हेक्टेयर वन को नुकसान पहुंचा है। जबकि वन विभाग को अब तक 17,13,411 रुपये का नुकसान हो चुका है।

जंगलों में आग क्यों लगती है ?

जंगलों में आग पेड़-पौधे नहीं लगाते हैं। आग तीली लगाती है। मतलब जंगलों की आग मानव जनित है। यदि समस्या मानव जनित है तो इसे दूर जरूर किया जा सकता है । उत्तराखण्ड के पहाड़ सूखे हैं, क्योंकि यहां पानी संरक्षण नहीं किया जाता। बारिश का पानी बह कर नीचे चला जाता है । जबकि हमें बारिश का पानी पहाड़ पर रोक कर रखना चाहिए । इससे जंगलों में नमी बनी रहेगी और आग फैलेगी नहीं । चीड़ के जंगलों में सबसे ज्यादा आग लगती है , क्योंकि उसकी नुकीली पत्ती में ऑयल होता है। चीड़ के जंगल में आग न लगे इसकी व्यवस्था सरकार या अधिकारी नहीं करते हैं ।