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होली 2020 – यहां रंग से नहीं चिता की राख से खेली जाती है होली

दुनिया के अलग-अलग देशों में फल-फूल से लेकर रंगों की होली खेली जाती है, लेकिन धर्म की नगरी काशी में चिता की राख से होली खेली जाती है। जी हां, वाराणसी के मॢणकर्णिका घाट पर गुलाल से नहीं बल्कि श्मशान में जलने वाले मृत शरीर की राख से होली खेली जाती है। इस अनोखी होली खलने से पहले अपराह्न मंदिर में भगवान शंकर का भव्य श्रंृंगार किया जाता है। व उनका पूजन किया जाता है। महादेव और गंगा की नगरी बनारस में होली का रंग भी अनोखा और अलग ही है। चिता, शव और मृत्यु में भी ये शहर जश्न में ऐसा डूबता है कि, यहां पर रंग के बजाय चिता के भस्म हवा में उड़ते हैं, और लोग उस भस्म में सराबोर होकर डूबते हैं। तो आइये आपको बताते हैं महादेव की नगरी काशी के इस अनोखी होली के बारे में —

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क्यों खेली जाती है चिता भस्म से होली

ऐसी मान्यता है कि, बाबा काशी विश्वनाथ ने अपना गौना कराने के बाद दूसरे दिन यहां के महाश्मशान में अपने गणों के साथ होली खेली थी। इसी मान्यता के अनुसार काशी में हर साल महाश्मशान में होली खेलने की परंपरा निभाई जाती है। आपको बता दें कि, मणिकर्णिका घाट को महाश्मशान कहा जाता है। पूरी दुनिया में यही एक ऐसा श्मशान घाट है जहां पर अनादि काल से चिताएं जल रही है और आज तक ये घाट कभी भी बिना चिता के नहीं रहा है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शंकर महाश्मशान में चिता भस्म की होली खेलते हैं।

अद्भुत होता है नजारा

दुनिया का एकलौता महाश्मशान मणिकर्णिका एक तरफ जलती चिताएं तो दूसरी ओर, चिताओं के भस्म से होली खेलते साधु औेर भक्त ढोल, मजीरे से लेकर डमरू पर झूमते दिखाई देते हैं। चारों तरफ सिर्फ हर-हर महादेव की गूंज सुनाई देती है। मान्यताओं के अनुसार, रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन से ही बाबा भोले अपने प्रिय गण, भूत, प्रेत और भक्तों के साथ महाश्मशान पर जलती चिताओं के बीच भस्म होली खेलते हैं। न जाने क्या माया है महादेव की, जो यहां पर आने वाला हर व्यक्ति जीवन के बाद मृत्यु के भय से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है।

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मणिकर्णिका घाट की कहानी

मणिकर्णिका घाट एक अद्भूत और अविस्मरणीय इतिहास से सजा हुआ है। इसका अतीत जितना पुराना है उतना ही विस्मयकारी भी है। मणिकर्णिका घाट वाराणसी में गंगानदी के तट पर स्थित एक प्रसिद्ध घाट है। एक मान्यता के अनुसार माता पार्वती जी का कर्ण फूल यहाँ एक कुंड में गिर गया था। जिसे भगवान शिव ने ढूढ़ा था। इसी के बाद से इस स्थान का नाम मणिकर्णिका पड़ गया। वहीं इस जगह को लेकर एक और दूसरी मान्यता भी है, जिसके अनुसार भगवान शंकर जी द्वारा माता पार्वती जी के पार्थीव शरीर का अग्नि संस्कार किया गया, जिस कारण इसे महाश्मसान भी कहते हैं।

सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा

बनारस के विद्वानों की मानें तो यहां की ये परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। हर साल इसका इस तीह आयोजन किया जाता है। इसे देखने के लिए देश-विदेश से हर साल बड़ी संख्या में लोग आते हैं। विदेशियों के बीच इसका खास महत्व है, कई विदेशी नागरिक तो हर साल इसको देखने आते हैं। आपको बता दें कि, ये परंपरा बहुत ही पुरानी है। इस दिन लोग मणिकर्णिका घाट पर चिताओं के भस्म से होली खेलते है। भेदभाव, छुआ-छूत, पवित्र-अपवित्र से परे होकर लोग एक दूसरे पर भस्म को बड़े ही प्रेम से फेकते हैं और हवा में सिर्फ भस्म ही उड़ता है। ये एक ऐसा नजारा होता है जिसे देखकर शायद कोई भी वास्तविक जीवन से दूर होकर महादेव के इस मणिकर्णिका घाट पर खो जाये।

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