पिथौरागढ़ : हिमालयी पर्वतमाला का प्रवेश द्वार है पिथौरागढ़, इन चमत्कारिक मंदिरों को देखने खिचे चले आते हैं पर्यटक

308

पिथौरागढ़- न्यूज टुडे नेटवर्क : वर्ष 1960 तक अंग्रजों की प्रधानता सहित पिथौरागढ़ अल्मोड़ा जिले का एक तहसील था जिसके बाद यह एक जिला बना। वर्ष 1997 में पिथौरागढ़ के कुछ भागों को काटकर एक नया जिला चंपावत बनाया गया तथा इसकी सीमा को पुनर्निर्धारित कर दिया गया। वर्ष 2000 में पिथौरागढ़ नये राज्य उत्तराखण्ड का एक भाग बन गया।यहां के अधिकांश प्राचीन मंदिर व किले पाल एवं चंद वंश के समय के बने हुए हैं। 15 वीं सदी में थोड़े समय के लिए इस पर ब्रह्म शासकों नें शासन किया। बाद में, चंद राजवंश के शासकों ने इस पर पुन:अधिकार कर किया और अंग्रेजों द्वारा इस पर आधिपत्य कायम करने तक शासन किया। ‘कुमाऊंनी’ यहाँ रहने वाली जनजातियों की भाषा है। यहां चूना पत्थर, तांबा, मैग्नीशियम, और स्लेट जैसे प्राकृतिक संसाधनों के प्रचुर भंडार हैं। यह हरे शंकुधारी वनों, साल, चीड़ और ओक वनों से घिरा हुआ हैं।यह स्थान पहाड़ी सांभर और बाघ के साथ-साथ कई पक्षियों और सरीसृपों का ठिकाना है।

210pith

यह भी पढ़ें-मुनस्यारी : बरबस ही पर्यटकों का मन मोह लेता है यह उत्तराखंड का “छोटा कश्मीर”, एक बार जरूर करें यहां की यात्रा

क्या है पिथौरागढ़ के आस पास

पिथौरागढ़ का किला

पिथौरागढ़ के दक्षिण में 8 किमी दूर स्थित थल केदार यहां का एक और लोकप्रिय धार्मिक आकर्षण का केन्द्र है। यहां से सुंदर अभयारण्य, अशरचूला घूमने का भी अवसर प्राप्त होता है। यह पिथौरागढ़ से बीस किमी दूर है। यह स्थान समुद्र तल से 5412 फुट की ऊंचाई पर बसा हुआ है। इसके अलावा, मुनस्यारी एक और लोकप्रिय पर्यटन आकर्षण है जो जौहर क्षेत्र के लिए एक प्रवेश द्वार की भूमिका अदा करता है। यह प्रवेश द्वार मिलम नामिक तथा रालम ग्लेशियरों में ले जाता है। पिथौरागढ़ का किला एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। हमले के बाद, 1789 में गोरखों नें इस किले को बनाया था।

यह भी पढ़ें-उत्तराखंड- देवभूमि है सबसे बेहतर पर्यटन स्थल, जहां आकर इंसान मिलता है सकून

kapileswar

कपिलेश्वर महादेव मंदिर

यहां कई चर्च, मिशन स्कूल, और इमारतें अंग्रेजों के समय की बनी हैं। पिथौरागढ़ घूमने की योजना में पर्यटक कपिलेश्वर महादेव मंदिर देख सकते हैं। यह मंदिर हिंदूओं के देवता भगवान शिव को समर्पित है। किसी लोककथा के अनुसार, प्रसिद्ध ऋषि कपिल नें इस स्थान पर तप किया था। शिवरात्रि के त्योहार के मौके पर भक्तों की भारी भीड़ इस मंदिर में दर्शनों के लिए आती है।

chadak.

चंडाक

चंडाक सोर घाटी के उत्तर में 7 किमी दूर है। यहां से हिमालय की ऊंची-ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के अलावा सोर घाटी का सुंदर नजारा भी दिखता है. यहां मग्नेसाइट खनन फैक्टरी भी है। हिमालय की ऊंची चोटियों की खूबसूरती और खूबसूरत सोर घाटी की सुंदरता में खोने के लिए पर्यटक यहां पहुंचते हैं। इसके अलावा चंडक से 2 किमी की दूरी पर मस्तमानू मंदिर भी है, जहां दर्शन करके स्थानीय लोग खुद को धन्य मानते हैं।

thal1

थल केदार शिव मंदिर

पिथौरागढ़ से लगभग 16 किमी कि दूरी पर स्थित थल केदार यहां का एक और लोकप्रिय धार्मिक आकर्षण का केन्द्र है। यहां से सुंदर अभयारण्य, अशरचूला घूमने का भी अवसर प्राप्त होता है। यहां भक्त भोले बाबा का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। ह मान्यता है कि जो भी भक्त इस मंदिर में आकर सच्चे मन से मनोकामना करता है , उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।

गंगोलीहाट का महाकाली मंदिर

गंगोलीहाट एक धार्मिक महत्व की जगह है. पारंपरिक गीत-संगीत और प्राचीन मान्यताएं यहां की पहचान हैं। यह स्थान महाकाली मंदिर के लिए भी मशहूर है, जहां स्वयं शंकराचार्य ने शक्ति पीठ की स्थापना की है। यहां नवरात्र के दौरान मेले का आयोजन होता है। गंगोलीहाट जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ से करीब 77 किमी दूर है।

patal bhuvanes

पाताल भुवनेश्वर का रहस्य

गंगोलीहाट से करीब 16 किमी उत्तर और बेरीनाग से करीब 20 किमी दक्षिण में है। आस्था के साथ साथ रोमांच को महसूस करना है तो आपके लिए गंगोलीहाट, पिथौरागढ़, उत्तराखंड से बढिय़ा जगह कोई नहीं हो सकती, गंगोलीहाट को पाताल नगरी भी कहा जाता है, पाताल भुवनेश्वर वहाँ जागरूक है और उनका पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ से हजार गुणा फल प्राप्त होता है अत: उससे बढक़र कोई दूसरा स्थान नहीं है। चार धाम करने का यश यहीं प्राप्त हो जाता है। कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ने क्रोधवश गणेशजी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर भगवान गणेश को हाथी का मस्तक लगाया गया था, लेकिन जो मस्तक शरीर से अलग किया गया, वह शिव ने इस गुफा में रख दिया। यहां भगवान शिव शंकर ने मनुष्य की सहायता करने के लिए गुफा के अंदर एक पूरा संसार बसाया हुआ है।

mosta

मोस्टामानु मंदिर

मोस्टामानु मंदिर पिथौरागढ़ किले के पास स्थित है, मुख्य पिथौरागढ़ शहर से लगभग 6 किमी दूर है। यह मंदिर भगवान मोस्टा को समर्पित है, जिसे इस क्षेत्र के देवता के रूप में माना जाता है। ईश्वर की पूजा करते हुए और समृद्धि और कल्याण के रूप में आशीर्वाद प्राप्त करते हुए भगवान मोस्टा के भक्त दूर-दूर तक यात्रा करते हैं लॉर्ड मोजा की दिव्य उपस्थिति का जश्न मनाने के लिए, अगस्त-सितंबर के महीने में एक स्थानीय मेला भी आयोजित किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त, यात्री, पर्यटक आदि शामिल होते हैं। यह मंदिर पूरी तरह से शहर और उच्च घाटी का एक मज़ेदार दृश्य को दर्शाता है मंदिर परिसर बड़ा है और आप यहाँ कुछ खास समय बिता सकते हैं। जो शरीर और आत्मा को शुद्ध वातावरण और आराम पहुंचाता है।

बेरीनाग का नाग मांदिर

बेरीनाग शहर के दक्षिण में 1 किलोमीटर की दूरी पर पेड़ों के समूह के दक्षिण में प्रसिद्ध सांप मंदिर का स्थान है जो भगवान विष्णु के उपासकों में से एक को समर्पित है। किंवदंतियों के अनुसार इस स्थान का नाम नागिनि राजा बेनिमाधव के बाद बरीनाग पड़ा। ऐसा माना जाता है कि जब महाराष्ट्र के पैंट यहां बसाए थे, तो उन्होंने बड़ी संख्या में सभी रंगों के सांपों को देखा और उनके प्रति सम्मान के रूप में उन्होंने चौदहवें शताब्दी में सांप मंदिर का निर्माण किया। यह एक लोकप्रिय धारणा है कि भगवान कृष्ण ने काली नाग पर विजय प्राप्त कर,उन्हें यमुना नदी छोडऩे और बर्फ की चोटियों के बीच जाने की सलाह दी थी, और काली नाग के पीछे कई अन्य सांप इस जगह पर आये थे। बेरीनाग से हिमालय का खूबसूरत नजारा तो दिखता ही है, साथ ही यहां के नाग मंदिर, त्रिपुरा देवी का मंदिर, कोटेश्वर मंदिर की गुफा और चौकोड़ी के चाय बागान खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं।

didhat

डीडीहाट की खूबसूरती

पिथौरागढ़ से करीब 55 किमी दूरी पर डीडीहाट की प्राकृतिक खूबसूरती प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर खींचने पर विवश कर देती है। इस इलाके में चंद वंश का राज चलता था। डीडीहाट का सीराकोट किला व मंदिर दर्शनीय स्थल है। यहां से हिमालय की पंचाचुली और त्रिशूली चोटियां साफ नजर आती हैं।

मुनस्यारी

चोटियों के दर्शन और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए यह जगह जानी हाती है। अगर आप मिलाम, रलाम और नामिक ग्लेशियर जाना चाहते हैं तो मुनस्यारी यहां जाने के लिए बेस कैंप है। मुंस्यारी जोहारा इलाके के द्वार के रूप में जाना जाता है. यह पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से 154 किमी दूर है और समुद्र तल से 2298 मीटर की ऊंचाई पर बसा है।

धारचुला

पिथौरागढ़ से धारचुला करीब 94 किमी दूर है। काली नदी के तट पर बसा धारचुला पिथौरागढ़ जिले के बॉर्डर पर है। यहां से नेपाल जाने के लिए सिर्फ काली नदी पर बने पुल को पार करके पर्यटक नेपाल पहुंच जाते हैं। दिनभर के लिए नेपाल जाना हो तो धारचुला सबसे अच्छी जगह है। इसके अलावा यहां की प्राकृतिक खूबसूरती के दीवानों की दुनियाभर में कमी नहीं है।

jauljibi-1

जौलजीबी प्रसिद्ध पर्यटन केन्द्र

पिथौरागढ़ नगर से 72 किमी की दूरी पर स्थित जौलजीबी एक प्रसिद्ध पर्यटन केन्द्र है। यहां गोरी और काली नामक दो नदियों का संगम होता है। यहां पर मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर एक मेला लगता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मेले का आयोजन पहली बार 1 नवंबर,1914 को हुआ था।

क्यों जाएं

यहां का इतिहास बेहद रोचक है, चंद वंश के राजाओं की निशानी के तौर पर उनका किला है। सुंदर घाटी है और पुरातन धरोहरें हैं। शरद ऋतु में यहां एक ‘शरदकालीन उत्सव’ मनाया जाता है। इस मेले में पिथौरागढ़ की सांस्कृतिक झांकी के दर्शन होते हैं। इसमें सुंदर-सुंदर नृत्यों का आयोजन होता है।

कितनी है दूरी

पिथौरागढ़ जाने के लिए नजदीकी पंतनगर एयरपोर्ट जिला मुख्यालय से 249 किमी दूर है। नजदीकी रेलवे स्टेशन टनकपुर 151 किमी और काठगोदाम रेलवे स्टेशन 212 किमी दूर है।

क्या है यहां का इतिहास

पिथौरागढ़ शहर के करीब ही एक गांव में मछली और घोंघे के जीवाश्म पाये गए हैं। इससे अंदाजा लगाया जाता है कि पिथौरागढ़ का इलाका हिमालय के निर्माण से पहले एक विशाल झील रहा होगा। काफी लंबे समय तक पिथौरागढ़ में खस वंश का शासन रहा है।

पिथौरागढ़ जाने का सबसे अच्छा समय

पिथौरागढ़ की यात्रा के इच्छुक पर्यटकों को गर्मियों में यहां आना उचित रहता है, क्योंकि इस समय यहां का वातावरण शांत व सुखद होता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here