हल्द्वानी- इस गांव के हर घर से है एक फौजी, फिर भी परिवार वालों को झेलनी पड़ रही ये मुसिबत

Slider

मानसून शुरू होते ही पहाड़ी जीवन और भी कठिनाइयों भरा हो जाता है। ऐसे में किसी भी तरह की कोई जानहानी न हो इसके लिए प्रशासन को मानसून शुरू होने से पूर्व ही अलर्ट के चलते सभी व्यवस्थाओं को पूर्ण करने को कहा जाता है। लेकिन बात अगर हल्द्वानी शहर से आठ किमी दूर काठगोदाम के दानीजाला गांव की करें तो यहां का मंजर देख प्रशासन की तैयारी और सरकार के विकास कार्यों, दोनो की ही पोल खुल जाती है। आलम यह है कि तेज वर्षा में इस गांव के लोग और बच्चे अस्थाई रोपवे के सहारे उफनाती गौला नदी को पार करने को मजबूर हैं। बच्चे अपनी जान को जोखिम में डालकर रोपवे के सहारे नदी पार कर शिक्षा प्राप्त करने अपने स्कूल जाते है।

haldwani kathgodam news

Slider

बता दें कि हल्द्वानी से 8 किलोमीटर दूर काठगोदाम स्थित दानीजाला गांव विकास कार्यों से कोसों दूर है। इस गांव में जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है। गौलानदी के पार बसे इस गांव के लोग आज भी बरसातों के समय रस्सी और तार से बनी ट्रॉली के सहारे उफनती नदी को पार करते हैं। इतना ही नहीं जब बरसात न हो तो ये लकड़ी का पुलिस नदी के उप्पर बिछाकर अपना रास्ता बनाते है। इन दिनों पुल नहीं होने की वजह से सबसे ज्यादा परेशानी स्कूल आने जाने वाले बच्चों को उठानी पड़ रही है। दानीजाला गांव को ब्रिटिश कालीन गांव कहा जाता है। करीब 30 परिवारों वाले इस गांव में हर परिवार से कोई न कोई सेना में सेवा दे रहा है। देश की रक्षा करने वालो के घर के लोग आज भी विकास से कोसों दूर है।

गांव वालों की माने तो इस गांव को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए कई बार आंदोलन भी किया गया। कई जनप्रतिनिधियों से भी मुलाकात की गई, लेकिन इनकी आवाज किसी ने नहीं सुनी। दानीजला गांव के लोग सामान्य दिनों में तो नदी को पैदल ही पार कर आते-जाते हैं। लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी बरसात के 3 महीनों में होती है। जब नदी उफान पर होती है। इस दौरान इस गांव का संपर्क शहर से टूट जाता है।

ग्रामीणों का आरोप है कि गांव को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए किसी सरकार या जनप्रतिनिधि ने कोई पहल नहीं की। गर्मी के दिनों में लकड़ी का अस्थायी फुल बनाकर नदी पार की जाती है। परेशानी उस वक्त बढ़ जाती है जब कोई बीमार होता है। ग्रामीणों का कहना है कि उन लोगों ने अपने खर्चे से ट्रॉली का निर्माण किया है और मजबूरन ट्रॉली में जान जोखिम में डालकर अपने बच्चों को स्कूल भेजते हैं।

उत्तराखंड की बड़ी खबरें