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हल्द्वानी-वीरों की भूमि है देवभूमि, शहादत देने में उत्तराखंड सबसे आगे

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हल्द्वानी-न्यूज टुडे नेटवर्क- (जीवन राज)- पुलवामा हमले के बाद आतंकियों से लोहा लेते शहीद मेजर मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल, मेजर चित्रेश बिष्ट, वीरेन्द्र राणा व मोहन लाल रतूड़ी की अंतिम विदाई में आसमां तक रोया। नमन है उन शहीदों को जो बलिदान देकर भारत मां के लिए शहीद हो गये। देवभूमि जाबांजों से भरी है। समय-समय पर यहां के वीरों ने भारत मां की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया। राज्य अलग होने के 19 साल में देवभूमि के 363 बहादुर बेटों ने देश की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया। यहां के कण-कण में वीर सपूतों के बलिदान की गाथा गायी जाती है। आज सेना के हर यूनिट में उत्तराखंड का जवान शामिल है। इस माटी ने देश को बड़े-बड़े अधिकारी दिये। जिसमें सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत के अलावा कई बड़े अधिकारी देवभूमि ने देश को दिये है।

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कारगिल युद्ध में 75 जाबांजों ने दिया बलिदान

देश के लिए शहादत की बात करें तो कारगिल युद्ध में देवभूमि के 75 जाबांजों मातृभूमि की रक्षा के लिए अपनी शहादत दी। वही वर्ष 2002 से 2012 तक 225 जाबांजों ने देश के लिए बलिदान दिया। वर्ष 2013 से 2918 तक 63 वीर मातृभूमि की रक्षा के लिए शहीद हो गये। वही अब तक अकेले नैनीताल जिले में 36 सैनिक और एक अधिकारी ने अपना बलिदान दिया है। कारगिल युद्ध में नैनीतला जिले के पांच जवान शहीद हुए। उत्तराखंड पहाड़ी राज्य होने से यहां के युवाओं का पहला रोजगार सेना में भर्ती होना होता है। पहाड़ों में 10वीं पास करने के बाद युवा सेना की तैयारी में जुट जाता है इसी का नतीजा है कि वह बड़े-बड़े पदों पर अपनी महारथ हासिल करता है।

वीरता ने दिलाये मेडल

वीरता का परिचय देने में देवभूमि के जवान कभी पीछे नहीं हटे। अपनी वीरता के दम पर देवभमि में एक परमवीर चक्र, 6 अशोक चक्र, 13 महावीर चक्र, 29 कीर्ति चक्र, 100 वीर चक्र, 169 शौर्य चक्र, 28 युद्ध सेवा मेडल, तीन उत्तम सेवा मेडल, मेशन इन डिस्पेच में 168 मेडल और नौसेना, वायु सेना मेें 745 मेडल हासिल किये है। जो देवभूमि की वीरता का परिचय देते है। कैसे जाबांजों ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिये। वर्ष 2008 में निदेशालय की एक रिपोर्ट के अनुसार अभी तक आबादी के अनुपात के अनुसार शहादत देने में उत्तराखंड पहले नंबर पर है जबकि हिमाचल दूसरे नंबर पर है। उत्तराखंड के एक लाख से भी ज्यादा जवान देशभर में कई मोर्चों पर डटे हुए है।