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हल्द्वानी-एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक से बन गया संत, जानिये कैसे बाबा नीम करौली महाराज ने किया चमत्कार

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(अमेरिकी डॉ. रिचर्ड एल्पर्ट और नीम करौली बाबा)-मनोवैज्ञानिक और साइकोडेलिक से संत रामदास बने अमेरिकी डॉ. रिचर्ड एल्पर्ट उर्फ बाबा रामदास का 88 वर्ष की उम्र में रविवार को निधन हो गया है। जिसके बाद उनके चाहने वालों मेें शोक की लहर दौड़ गई। अमेरिकी डॉ. रिचर्ड एल्पर्ट उर्फ बाबा रामदास आध्यात्मिक गुरु नीम करोली बाबा के भक्त थे। एल्पर्ट साल 1967 में साइकेडेलिक शोध के लिए भारत आए थे। यहां वे आध्यात्मिक गुरु नीम करोली बाबा से मिले। बाबा ने ही डॉ रिचर्ड एल्बर्ट को उनका नया नाम रामदास दिया था। जिसके बाद एल्पर्ट लोगों को जीवन के बन्धनों से मुक्त होने का ज्ञान देने लगें।

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रामदास वर्ष1967 में जब बाबा नीब करौली महाराज से मिले तो उसके बाद उनकी जिंदगी ही बदल गई। डा. एल्पर्ट अपनी मां को बहुत प्यार करते थे। मां के निधन से वह बहुत बेचैन हो गए थे। वह हर रात तारों की तरफ देखकर यही सोचते रहते थे कि इन्हीं में से एक तारा उनकी मां भी है। एल्पर्ट रामदास ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि नीम करौली महाराज ने उन्हें पहली मुलाकात में ही यह बात बता दी कि उनके दिल में मां के लिए क्या बात चल रही है। इस पर डा. एल्पर्ट बाबा जी के गले लगकर खूब रोये। बाबा जी से मिलने के बाद उन्हें असीम शांति का अनुभव हुआ। इसके बाद प्रो. एल्पर्ट ने बाबा को अपना गुरु बना लिया।

बता दें कि डॉ. रिचर्ड एल्बर्ट का जन्म 1930 के आसपास बोस्टन, मैसाचुसेट्स में हुआ था। मनोविज्ञान में हॉवर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गए। इसके बाद वर्ष 1961 तक 5 साल के मनोविश्लेषण के बावजूद वो बहुत डिप्रेस, परेशान और चिंतित रहते थे। इसके कारण वो भारी मात्रा में धूम्रपान आदि नशा करते थे। जानकार बताते हैं कि उन्हें अपने परिवार से भी कोई लगाव नहीं था। शायद मनोविज्ञान के बारे में उनकी समझ से मोहभंग हो गया था। वो लेरी के साथ जुडऩे के बाद और भी ज्यादा इसी तरह की उदासी में डूबते जा रहे थे।

बाबा नीब करौली के साथ उन्होंने करीब डेढ़ साल तक रहकर दीक्षा ली और योग आदि भी सीखा। उन्होंने हिंदू धर्म अपनाने के साथ ही हिंदू धर्म के बारे में काफी अध्ययन किया। करीब डेढ़ साल बाद वह अमेरिका लौटे और उन्होंने अमेरिका में वर्ष 1974 में राम दास ने हनुमान फाउंडेशन बनाया। ये पूरी तरह नॉन प्राफिट आधार पर था जिसका काम सिर्फ सेवा की भावना को बढ़ाना था। यहां से आगे वो और सीता लो ज़ॉफ़ द्वारा निर्देशित हनुमान फाउंडेशन ने प्रिजऩ.आश्रम प्रोजेक्ट पर काम किया। इसके जरिये जेल के कैदियों को आध्यात्मिक रूप से बदलने का काम शुरू हुआ। इसके बाद स्टीफन लेविन के साथ डेथिंग प्रोजेक्ट के जरिये करुणा की भावना के साथ मौत का सामना करने की चेतना जगाई जा रही थी।

एल्पर्ट रामदास ने 15 किताबें लिखी हैं। इनमें कई पुस्तकें काफी चर्चित रही हैं। बाबा जी के बारे में लिखी गई मिरेकल ऑफ लव पुस्तक काफी चर्चित रही है। इस पुस्तक में नीब करौली बाबा से जुड़ी घटनाओं का वर्णन है। एल्पर्ट रामदास को अमेरिका में कई पुरस्कार भी मिले हैं। वर्ष1996 में अमेरिका में शुरु किया गया उनका रेडियो टॉक कार्यक्रम हेयर एंड नाउ विद रामदास काफी चर्चित हुआ। वर्ष 1997 में उन्हें लकवा पड़ गया जिससे उनका भ्रमण करना काफी कम हो गया लेकिन आखिरी दिनों में भी वह अपनी वेबसाइट आदि के जरिये हिंदू धर्म के प्रचार -प्रसार के लिए काम करते रहे।

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