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पूर्व आप नेता ने केजरीवाल सरकार के दावों को बताया झूठ , बोले जमीन पर नहीं सिर्फ विज्ञापनों पर हुआ काम

देहरादूनः दिल्ली में आप नेता कपिल मिश्रा को सिर्फ इस बात से निष्कासित किया गया कि उन्होंने दिल्ली में जोर जोर से पीटे जा रहे शिक्षा व्यवस्था के ढोल की पोल खोली। उन्होंने दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को 10 सवालों का जवाब देने की चुनौती दी थी। वह सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। बेशर्मी की हद यह कि दिल्ली में खुले सवालों से भागते फिर रहे वहां के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया उत्तराखंड से सवाल पूछने आ गए। हालांकि गनीमत यह रही कि जनता के साथ किसी ने भी उन्हें कोई भाव नहीं दिया।

आप पार्टी के कारनामों की पोल खोलने वाले कपिल मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से पत्रकार वार्ता में यह चुनौती दी थी कि दिल्ली में शिक्षा क्रांति नहीं विज्ञापन क्रांति की गई है. उनका आरोप है कि दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था फेल है। लेकिन सवालों पर सिसौदिया की चुप्पी साध गए।कपिल मिश्रा ने साफ कहा कि अगर दिल्ली के सरकारी स्कूल बेहतर हुए तो सरकारी स्कूल छोड़कर बच्चे प्राइवेट स्कूलों में क्यों गए। उन्होंने दिल्ली सरकार द्वारा जारी इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2014-15 में जहां दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों का शेयर केवल 31 फीसद था, वर्ष 2017-18 में वह बढ़कर 45.5 फीसदी से भी अधिक हो गया।

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में इस तरह कम हुई छात्र छात्राओं की संख्या

2014 में एक लाख 66 हजार बच्चे 12वीं की परीक्षा में बैठे.
2015 में एक लाख 40 हजार
2016 में एक लाख 31 हजार
2017 में एक लाख 21 हजार
2018 में केवल एक लाख 11 हजार
10वीं का रिजल्ट ठीक दिखाने को 50 फीसदी बच्चों को 9वीं में फेल किया

मिश्रा ने ट्विट में सवाल किया है कि 10वीं का रिजल्ट ठीक दिखाने के लिए करीब 50 फीसदी बच्चों को 9वीं में फेल किया गया। दिल्ली में 2016-17 में 47.7 फीसदी बच्चे 9वीं क्लास में फेल किए गए और 10वीं पास करके 11वीं में आए बच्चों में से भी 20 फीसदी बच्चे फेल किए गए।

कहा कि शिक्षा के बजट को विज्ञापन पर बहाया जा रहा है। लेकिन क्या मनीष सिसोदिया ये बताएंगे कि बजट खर्च कितना होता है? 2017-18 में शिक्षा बजट में से ₹2000 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं हुए। पिछले पांच सालों में शिक्षा बजट ना खर्च करने का आंकड़ा हर साल 2000 करोड़ रुपये के आसपास ही रहा हैं. यानी केवल बजट की घोषणा हुई और काम कुछ नहीं हुआ।

उन्होंने सवाल किया है कि दिल्ली में कितने नए सरकारी स्कूल बने, बने बनाए स्कूलों में कमरे नहीं, असली में कितने नए स्कूल बने, जवाब है पांच साल में जीरो नए सरकारी स्कूल. दिल्ली में लगभग 15,000 अस्थायी कमरे बनाए गए पहले से बने स्कूलों में. लगभग 3000 स्कूल पहले से बने हैं. औसतन एक स्कूल में पांच नए कमरा बने. सात साल में एक स्कूल में पांच नए कमरा बनाना, वो भी अस्थायी. क्या ये शिक्षा क्रांति कहलायेगा?

सवाल किया है कि ना नए स्कूल बने, ना नए कॉलेज बने, ना टीचर्स की भर्ती हुई, ना शिक्षा बजट खर्च हुआ, ना पीने का पानी तक स्कूलों तक पहुंचा, हुआ तो केवल विज्ञापन और मीडिया मैनेजमेंट. ये शिक्षा क्रांति नहीं विज्ञापन क्रांति हैं. और आखिरी सवाल दिल्ली में जगह-जगह विज्ञापन और होर्डिंग लगाने वाली एजेंसी के मालिक और आपके सगे साले साहब का आपस में क्या रिश्ता है।थोड़ी शर्म होती तो उत्तराखंड में सवाल पूछने आने से पहले दिल्ली के शिक्षा मंत्री को अपने राज्य की लचरता पर उठे सवालों का जबाब देना चाहिए था।

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