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देहरादून- सुप्रिम कोर्ट में उमेश कुमार की याचिका हुई खारिज, जाने क्या है पूरा मामला

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सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने अपने खिलाफ दाखिल 3 आपराधिक मुकदमों को दून से दिल्ली स्थानांतरित करने की मांग की थी। जस्टिस ऋषिकेश रॉय की पीठ के समक्ष पत्रकार ने दलील दी कि उत्तराखंड की भाजपा सरकार उसे निशाना बना रही है। इस पर पीठ ने कहा, स्टिंग ऑपरेशन करने वाली टीम के सदस्य खुद आपकी पत्रकारिता की सत्यता पर सवाल उठा रहे है।

इतने मामले है लंबित

ऐसे में इन मामलों को स्थानांतरित करने का मतलब नहीं। पीठ ने कहा, पत्रकार उमेश कुमार शर्मा ने जिन मामलों को स्थानांतरित करने की मांग की है। इनके अलावा उनपर कई मामले यूपी, प.बंगाल, दिल्ली व झारखंड में लंबित है। इनमें 17 उत्तराखंड, 4 यूपी, 5 प.बंगाल और 2 दिल्ली के है। जिनमें 1 की सीबीआई जांच हो रही है। रांची में भी 1 मामला है। कहा जिन मामलों के स्थानांतरण की मांग है उनमें दो संपत्ति, विल से जुड़ा है। जिनमें एक करीब दस साल से लंबित है।

जाने क्या है पूरा मामला

दरअसल समाचार प्लस के CEO और एडिटर इन चीफ़ उमेश कुमार उत्तराखंड सरकार द्वारा कई मुक़दमे में घिरे हुए हैं। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण मुक़दमा 100/2018 PS राजपुर देहरादून का है। जिसमें उमेश कुमार पर उन्हीं के संपादक द्वारा ब्लैकमेलिंग और सरकार गिराने की साज़िश का आरोप लगाया गया था। हालाँकि इस मुक़दमे में उमेश कुमार की गिरफ़्तारी हुई और बाद में उत्तराखंड उच्च न्यायालय से उन्हें बेल मिली इसके बाद उमेश कुमार द्वारा नामचीन वकीलों की लंबी चौड़ी क़तार खड़ी कर उत्तराखंड के सभी मुकदमों में स्टे ले लिया गया था। उमेश कुमार के वकीलों ने पहले तो नैनीताल हाईकोर्ट में भरसक प्रयास कर उन पर दायर मुक़दमा को ख़ारिज कराने की भरपूर कोशिश करी। लेकिन कोर्ट से राहत न मिलने के बाद उमेश कुमार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जहाँ उन्हें सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली और उनके सभी मुकदमों में प्रोसीडिंग स्टे दे दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब तक ट्रांसपोर्टेशन की सुनवाई नहीं हो जाएगी तब तक उमेश कुमार पर उत्तराखंड सरकार और प्राशन की ओर से किसी प्रकार की कोई भी कार्यवाही किसी भी मुक़दमे से संबंधित नहीं की जाएगी यह आदेश मुलज़िम पक्ष के लीए संजीवनी का कर गया लेकिन उत्तराखंड सरकार ने मज़बूती से सुप्रीम कोर्ट में अपने सरकारी अधिवक्ताओं के साथ मामले को ख़ारिज करवाने की कवायद शुरू कर दी। इसी मामले में कंप्लेंट पंडित आयुष के वक़ील अरविंद शुक्ला ने बताया कि बेहद चालाकी से मुलज़िम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर पेटिशन दायर कर सिर्फ़ उन्हीं लोगों को नोटिस दिया जो कि मुल्ज़िम पक्ष थे यानी सह अभियुक्त थे, वहीं उनके क्लाइंट और मामले के काम्प्लमेंट पंडित आयुष को इस मामले में कोर्ट में कुछ भी कहने का मौक़ा नहीं मिला। मामले की गंभीरता देख वादी के वक़ील अरविंद शुक्ला ने इंटरवेनशन नोटिस भी दाख़िल किया और अदालत से गुज़ारिश की कि वादी को भी इस मामले में अपना पक्ष रखने की इजाज़त दी जाए। जिसे कोर्ट ने स्वीकार किया तक़रीबन 4-5 सुनवाईयों में दोनों तरफ़ से वकीलों ने जमकर बहस करी उत्तराखंड की और से जे. एस रावत, कुलदीप परिहार व अन्य अधिवक्ता निरंतर भिड़े रहे और उमेश कुमार की ओर से कपिल सिब्बल ने बहस करी।

हालाँकि स्टेट और वादी की ओर से वकीलों ने कोर्ट को बताया कि किस तरह 27 से ज़्यादा मुक़दमे होने के बावजूद भी उमेश कुमार सिर्फ़ एक मुक़दमे में जेल गए, इसके अतिरिक्त बलात्कार वसूली क़ब्ज़ा और कई अन्य धाराओं पर दर्ज मुक़दमे में एक बार भी इन्हें गिरफ़्तार तक नहीं किया गया। ऐसे में उमेश कुमार का रसूख़ नोएडा NCR में बख़ूबी समझा जा सकता है। वकीलों ने यह भी बताया कि उमेश कुमार के ऊपर लगे बलात्कार के आरोप में फ़ाइनल रिपोर्ट लग गई व मुक़द्दमा करने वाली लड़की को ही उमेश कुमार द्वारा पुलिस से साठगांठ कर जेल भेज दिया गया। ऐसे में तमाम गवाह और मुक़दमे से जुड़े अन्य लोगों के ऊपर दबाव बनाने की आशंका पूर्ण रूप से की जा सकती है इसलिए मुक़दमे की सुनवाई उत्तराखंड में ही होनी चाहिए न कि दिल्ली NCR में। वकीलों ने यह भी बताया कि पूर्व में उमेश कुमार के ऊपर दर्ज कई मुक़दमा को उत्तराखंड सरकार ने वापस लिया ऐसे में यह कहना कि उत्तराखंड में फ़ेयर ट्रायल नहीं हो पाएगा यह पूरी तरह से ग़लत होगा। अभियोजन पक्ष की तरफ़ से वकीलों ने जो दलील रखी उसे मुलज़िम पक्ष के वक़ील कपिल सिब्बल और कोर्ट ने भी माना और अब उमेश कुमार के ख़िलाफ़ यह फ़ैसला आने से उनकी मुश्किलें बढ़ती नज़र आ रही है।

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