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देहरादून- उत्तराखंड के इस लाल का डांडी यात्रा के अमर सैनानियों में गिना जाता है नाम, इतना संघर्ष भरा रहा जीवन

उत्तराखण्ड का पर्वतीय क्षेत्र हमेशा से ही त्याग, तपस्या व बलिदान की भूमि रहा है। आजादी के दीवानों की देवभूमि में कोई कमी नहीं है। हमरी आज की शख्सियत भी एक ऐसे ही शख्स के बारे में है, जिनका नाम है ज्योतिराम कांडपाल…

डांडी यात्रा में हुए शामिल

ज्योतिराम कांडपाल का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा में सन् 1892 को हुआ। उनकी प्राथमिक शिक्षा अल्मोड़ा जूनियर हाई स्कूल से हुई। शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त कर उन्होंने शिक्षण का कार्य शुरू किया। ज्योतिराम बचपन से ही साहसी, निड़र व मुसीबतों से जूझने वाले व्यक्ति थे। यही कारण रहा कि अपने कार्य के दौरान वे शोषित पीड़ित, सामाजिक भेदभाव, छुआ छूत व गुलामी की बेड़ी से स्वतंत्रता प्राप्ति के उद्देश्य से घर से निकल पड़े। उस समय पूरे देश में महात्मा गांधी की लहर थी।

jyotiram kandpal freedom fighter uttarakhand

महात्मागांधी से मुलाकात के बाद 1926 में उन्होंने शिक्षक पद का त्याग किया। जिसके बाद वह साबरमती आश्रम पहुंच गए। पण्डित ज्योतिराम हिन्दी साहित्य के अच्छे ज्ञाता थे। वे महात्मागांधी के लिए भी हिन्दी में पत्रों का उत्तर लिखते थे। 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने साबरमती आश्रम डांडी यात्रा आरम्भ की तथा नमक कानून तोड़ा। इस यात्रा में ज्योतिराम कांडपाल ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और डांडी यात्रा में कदम से कदम मिला कर चले।

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नमक कानून तोड़ने के कारण उन्हे जेल की भी जाना पड़ा। गुजरात सरकार द्वारा जारी डांडी यात्रा सूची में ज्योतिराम का नाम 68वें क्रम में अंकित है। 46 वर्ष की उम्र में 19 जनवरी 1938 को उनकी मृत्यु हो गई। अल्मोड़ा के चौंकोट के लोग आज भी किसी सामाजिक व सामूहिक कार्य का शुभारम्भ करते समय डांडी यात्रा के अमर सैनानी ज्योतिराम कांडपाल को श्रद्धा-सुमन अर्पित करना नही भूलते हैं।

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