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देहरादून- श्रीधर किमोठी को इसलिए कहते थे उत्तराखंड का “आजाद”, पहचान छिपाने के लिए पहना चोला

श्रीधर किमोठी उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानी थे। वे 1952 से 1958 तक गढ़वाल बोर्ड के चेयरमैन भी रहे। उनको उत्तराखंड के आजाद के नाम से भी जाना जाता था। उनका जन्म चमोली के भिकोना गांव में 1919 को हुआ। बचपन से ही सहासी और निडर आजाद होश समालते ही आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह में उनको 9 महिने की जेल भी हुई। 1942 में वे दो साल तक नज़रबंद रहे। 2005 में 8 सिंतबर को उनकी मृत्यु हो गई।

पहचान छिपाने के लिए पहना चोला

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही अपनी पहचान गुप्त रखने के लिए आज़ाद जी ने जो एक बार लम्बा भगवा चोला धारण किया तो फिर आजीवन उसे ही अपनी वेशभूषा बनाए रखा। लम्बी दाढ़ी और भगवा चोले में वे पहली नज़र में सन्यासी ही लगते थे। ऐसा उनके साथ अक्सर होता था कि वे किसी स्कूल में जाते और गुरूजी कहते कि बाबाजी भिक्षा तो गाँव में मिलेगी। इस पर वे कहते कि भिक्षा नहीं मुझे हाज़िरी रजिस्टर दे दो, मैं आज़ाद हूँ।

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