देहरादून- पर्वतीय क्षेत्रों में गर्भावस्था बनती जा रही चुनौती, पहाड़ की रीढ़ ऐसे हो रही कमज़ोर

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उत्तराखंड की महिलाओं को पहाड़ की रीढ़ कहा गया है। ऐसे में महिला स्वास्थ्य का महत्व और बढ़ जाता है। लेकिन, उत्तराखंड के दुरूह क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं लचर होने से छोटी-छोटी बीमारी में भी महिलाओं को सैकड़ों किलोमीटर का चक्कर काटना पड़ता है। महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर यहां सरकारें कितनी गंभीर रही हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य गठन के दो दशक पूरे होने वाले हैं और अब भी पहाड़ों पर गर्भवतियों को डोली में बिठाकर अस्पताल पहुंचाना पड़ता है। इन हालात में कभी प्रसव सड़क किनारे हो जाता है तो कभी अस्तपाल के गेट पर।

पर्वतीय क्षेत्रों में गर्भावस्था एक चुनौती

हर साल 28 मई को अंतरराष्ट्रीय महिला स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। एक महिला अपने जीवन में कई अलग-अलग अनुभवों से गुजरती है। जिसमें गर्भावस्था एक अलग तरह का अनुभव है। नौ माह की इस अवधि में उसके स्वास्थ्य में भी तमाम उतार-चढ़ाव आते हैं। जिसमें काफी देखभाल की जरूरत होती है। लेकिन, हकीकत यह है कि सुरक्षित प्रसव का दावा करने वाली सरकारें अब भी प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में उस अनुरूप इंतजाम नहीं कर पाई हैं। एक तो पहाड़ की विषम भौगोलिक स्थिति और उस पर स्वास्थ्य सुविधाओं का टोटा। दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में गर्भावस्था खुद में एक चुनौती है।

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नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) के प्रभारी अधिकारी डॉ. कुलदीप मर्तोलिया का कहना है कि हाल में इस ओर कई कदम उठाए गए हैं। जिनमें मैचरल केयर सेंटरों को सुदृढ़ करने, एनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम, डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर से हीमोग्लोबिन की जांच का प्रावधान, सुमन कार्यक्रम के तहत सम्मानजनक देखभाल आदि शामिल है। इसी का नतीजा है कि मातृ मत्यु दर में 112 अंकों की गिरावट आई है। इसके अलावा शिशु मृत्यु दर में भी छह अंकों की गिरावट दर्ज की गई है। सैंपल रजिस्ट्रेशन प्रणाली के सर्वे के अनुसार नवंबर 2019 में मातृ मृत्यु दर 201 प्रति लाख से घटकर 89 प्रति लाख पर आ गई है।

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