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उत्तराखंड में आपसी फूट के कारण पत्ते की तरह बिखर गई कांग्रेस, ये हैं गुटबाजी के बड़े कारण

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देहरादून -न्यूज टुडे नेटवर्क : प्रदेश में कांग्रेस की अंर्तकलह से लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लुटिया डूब गई। पूरे चुनाव में कांग्रेसी दिग्गज एक मंच पर कहीं नजर नहीं आए। आपसी कलह के चलते कांग्रेस की चुनावी तैयारियां भी पूरी तरह से प्रभावित हुई। ऊपर से 2017 के चुनाव में कई कांग्रेस दिग्गज भाजपा में शामिल हो गए थे। जिसके बाद से कांग्रेस में मुख्य लीडरशिप की कमी खल रही थी। जिसके चलते कांग्रेस चुनाव में अपने में माहौल तैयार करने में पूरी तरह से विफल साबित हुई।

सूबे में 2014 का इतिहास दोहराया गया है। पिछली बार भी राज्य की पांचों सीटें बीजेपी के खाते में गई थीं। वैसे तो पूरे देश में 2014 की तरह ही इस बार भी मोदी लहर दिखाई दी। जिसके चलते लोस चुनाव में भाजपा पहली पार्टी बन गई है, जिसके खाते में 60 प्रतिशत से अधिक मत आए। भगवा ब्रिगेड यह मिथक तोडऩे में भी कामयाब रही कि प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार रही है, उसे लोकसभा चुनाव में हार देखनी पड़ती है।

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कांग्रेस की पराजय के कारण

कांग्रेस की ऐसी पराजय के पीछे कुछ दूसरी बड़ी वजहें भी हैं। उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य में भी कांग्रेस नेताओं के बीच आपसी फूट नजर आई। हरीश रावत, प्रीतम सिंह, इंदिरा हृदयेश एक-दो मौके पर ही साथ दिखे। बाकी सब अलग-अलग कांग्रेस को मजबूत करने का दावा करते रहे। जिसके चलते नतीजा ये हुआ कि पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में कांग्रेस ज्यादा बड़े अंतर से हार गई, और तो और पार्टी के दो बड़े दिग्गज बुरी तरह से हार गए। राज्य में कांग्रेस के दो बड़े दिग्गज प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह टिहरी से और हरीश रावत नैनीताल सीट से खुद चुनाव हार गए।

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पहली बार इतने बड़े अंतर से हारे कांग्रेसी

2014 की तुलना में कांग्रेस प्रत्याशियों की इस बार बड़ी हार हुई है। टिहरी से माला राजलक्ष्मी शाह 2014 में 1.92 लाख वोटों से जीती थीं, लेकिन इस बार तो जीत का अंतर 2 लाख पार कर गया। ऐसा ही हाल हरीश रावत का नैनीताल सीट पर हुआ है। पहली बार लोकसभा का चुनाव लडऩे वाले प्रदेशाध्यक्ष अजय भट्ट करीब 3.35 लाख वोटों से हरीश रावत को पटखनी देने में कामयाब रहे। सबसे बड़ी बात तो अल्मोड़ा सीट की है। यहां से राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा अब तक के सबसे बड़े अंतर 2.32 लाख वोटों से चुनाव हार गए। हरिद्वार और गढ़वाल की भी कुछ ऐसी ही है। वैसे तो कांग्रेस 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बुरी तरह हार गई थी, लेकिन ऐसा लग रहा था कि सत्ता विरोधी लहर और विपक्ष के संघर्ष के चलते उसे लोकसभा में थोड़ा फायदा होगा, लेकिन हुआ उसके उलट।

कई राजनीतिक मोर्चों पर जूझ रही कांग्रेस

कांग्रेस एक साथ कई राजनीतिक मोर्चों पर जूझ रही है। पहला तो यह कि उसकी पूरी लीडरशिप 2017 के चुनाव से पहले भाजपा में आ गई थी। इस वजह से हर जिले में उसका काडर भी ध्वस्त हो गया। जो नेता बचे भी वह भी अपनी-अपनी राह पर चलते रहे। 2 साल पहले प्रीतम सिंह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए थे, लेकिन आपसी खींचतान के कारण आज तक वह अपनी टीम यानि प्रदेश की कार्यकारिणी तक नहीं बना सके।

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मेन मुद्दे उठाने में नाकाम रही कांग्रेस

इधर इंदिरा हृदयेश कभी इधर तो कभी उधर रुख करती रहीं। हाल ये हुआ कि जिस मुद्दे पर कांग्रेस प्रदेश की भाजपा सरकार को घेर सकती थी उन मुद्दों पर भी उसका संघर्ष तक देखने को मिला। 2017 विधानसभा चुनाव और अब 2019 लोकसभा चनाव में मिली प्रचंड हार के बाद कांग्रेस चारों खाने चित्त है। माना जा रहा है कि पार्टी को सर्वाधिक नुकसान उसके चुनावी घोषणा पत्र में अफस्पा और धारा 370 की घोषणा से हुआ। इसके बावजूद कांग्रेस उम्मीद लगाए हुए थी कि कम से कम दो सीटों नैनीताल और टिहरी में उसे जीत मिलेगी

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