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छत्तीसगढ़ सरकार अब राजधानी में बनाएगी विवेकानंद स्मारक

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स्वामी विवेकानंद की यादों को अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में संजोया जाएगा। क्योंकि अब राजधानी में बूढ़ापारा स्थित ऐतिहासिक भवन डे हाउस को अब सरकार स्मारक बनाएगी। इसकी घोषणा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने की। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद वर्ष 1877-79 के मध्य छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान रायपुर में जिस स्थल पर रुके थे, वहां उनका स्मारक बनाया जाएगा। दरअसल वह स्थान रायबहादुर भूतनाथ डे चेरिटेबल ट्रस्ट के अधीन है। उचित व्यवस्थापन तय न हो पाने की सूरत में यहां कुछ भी काम अब तक नहीं हो सका था। लेकिन अब 2 जनवरी को हुए कैबिनेट के फैसले में ट्रस्ट को जमीन और भवन देने के मुद्दे पर निर्णय लिया गया। बघेल ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने शिकागो सम्मेलन में विकसित देशों और भारत के मध्य एक सेतु का काम किया, इसके माध्यम से भारत के पुरातन आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान का प्रसार विदेशों में संभव हो सका।

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यह होगा स्मारक में

संस्कृति विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक यहां स्वामी विवेकानंद से जुड़ी पुस्तकें, उनके रायपुर आने की घटनाओं का चित्रण, उनके भाषण, विवेकानंद के अनमोल विचार और उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को दिखाती गैलेरी बनाई जा सकती है। चूंकि फिलहाल भवन को खाली कराए जाने की प्रक्रिया होनी है, इसके बाद यह प्रोजेक्ट और भी चीजों को शामिल कर शुरू किया जाएगा। भवन के खाली होने के बाद इसके ढांचे को पुरातत्व विभाग के एक्सपर्ट वैसे ही सहेजेंगे जैसा यह सालों पहले हुआ करता था।

विनोबाभावे व स्वामी विवेकानंद की जयंती एक साथ

मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वामी विवेकानंद की शिकागो यात्रा की 125वीं वर्षगांठ और विनोवा भावे की जयंती दोनों का एक साथ होना संयोग की बात है। स्वामी विवेकानंद की मानव सेवा, जीव सेवा, सर्व धर्म समभाव के विचारों से हमें सीख लेनी चाहिए। स्वामी रामकृष्ण परमहंस की भावधारा का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करना चाहिए। बघेल ने कहा कि स्वामी विवेकानंद का विचार था कि गरीब, पीडि़त, बीमार लोगों की सेवा ही नारायण की सेवा है। वर्तमान में हमें विवेकानंद और महात्मा गांधी के विचार के अनुरूप मानवता की सेवा के लिए आगे आने की जरूरत है।

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स्वामी विवेकानंद ने यहां बिताया था अपना बचपन

रायपुर में स्वामी विवेकानंद ने सन 1877 से 1879 के बीच अपना बचपन बिताया था। रायपुर का एयरपोर्ट हो या प्रमुख तालाब यह विवेकानंद के नाम पर किए जाने के पीछे की असल वजह है। रायपुर के रामकृष्ण मिशन से मिली जानकारी के मुताबिक सन् 1877 ई. में स्वामी विवेकानंद रायपुर आये । तब उनकी आयु 14 वर्ष की थी और वे मेट्रोपोलिटन विद्यालय की तीसरी श्रेणी (आज की आठवीं कक्षा के समकक्ष) में पढ़ रहे थे। उनके पिता विश्वनाथ दत्त तब अपने काम की वजह से तब रायपुर में ही रह रहे थे। विवेकानंद अपने छोटे भाई महेन्द्र, बहन जोगेन्द्रबाला तथा माता भुवनेश्वरी देवी के साथ कलकत्ता से रायपुर के लिये रवाना हुए । तब ट्रेन की सुविधा रायपुर तक नहीं थी। माना जाता है कि तब वह जबलपुर तक ट्रेन से आए इसके बाद रायपुर बैलगाड़ी से आए। इस यात्रा में 15 दिनों का वक्त लगा।

विवेकानंद संगीत के बेहद अच्छे कलाकार थे

विवेकानंद अपने पिता के साथ रायपुर के भवन में खाना भी पकाया करते थे। रायपुर में उन्होंने शतरंज खेलना भी सीख लिया, फिर यहीं विश्वनाथ बाबू ने विवेकानंद को संगीत की पहली शिक्षा दी । विवेकानंद को बचपन से ही संगीत से बेहद लगाव था, उनके पिता भी संगीत में बेहद अच्छे कलाकार थे। इस वजह से आए दिन शाम के वक्त यहां संगीत के रियाज से गलियां गूंजा करती थीं। विवेकानंद आगे चलकर अच्छे गायक भी बने।

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