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छठ पूजा 2019 – जानिए छठ पूजा का महत्व, शुभ मुहूर्त व छठ पूजा का विधि विधान

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छठ पूजा 2019 – नवरात्रि, दिवाली की तरह ही छठ पूजा भी हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। खासकर, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई वाले क्षेत्रों में छठ पूजा की अनूठी छठा देखने को मिलती है। छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्यदेव की उपासना का पावन पर्व है जो चार दिनों तक चलता है, जो चैत्र शुक्ल चतुर्थी से आरंभ हो कर चैत्र शुक्ल सप्तमी तक चलता है। इस दौरान लगातार 36 घंटे का व्रत रखा जाता है। पहला दिन नहाय खाय होता है, इस दिन सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ग्रहण की जाती है।

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दूसरे दिन खरना पूजा के साथ उपवास शुरू होता है। इस दिन भर व्रत करने के बाद शाम को सूर्यास्त के समय पूजा करने के बाद खीर का भोग लगा कर उसका प्रसाद ग्रहण किया जाता है। तीसरे दिन यानि षष्ठी को डूबते हुए सूर्य को दूध और जल से अर्घ्य अर्पण करते हैं। अंत में सप्तमी के दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दे कर चार दिन की ये पूजा सम्पन्न होती है। छठ पूजा पर स्नान और दान को भी विशेष महत्व दिया जाता है। तो आइए जानते हैं छठ पूजा शुभ मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और कथा के बारे में…

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छठ पूजा 2019 शुभ मुहूर्त

छठ पूजा के दिन सूर्योदय – सुबह 6 बजकर 33 मिनट
छठ पूजा के दिन सूर्यास्त – शाम 5 बजकर 35 मिनट
षष्ठी तिथि आरंभ -रात 12 बजकर 51 मिनट से (2 नवंबर 2019)
षष्ठी तिथि समाप्त – दोपहर 1 बजकर 31 मिनट तक (3 नवंबर 2019)

छठ पूजा तारीख

  • 31 अक्टूबर 2019 को नहाय-खाय
  • 1 नवंबर 2019 को लोहंडा और खरना
  • 2 नवंबर 2019 और संध्या सूर्य अर्घ्य
  • 3 नवंबर 2019 को पारण तिथि

छठ पूजा व्रत विधि

छठ पूजा का पहला दिन – छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी का नहाय खाय के साथ शुरू हो जाती है। इस दिन व्रत रखने वाले स्नान आदि कर नये वस्त्र धारण करते हैं। और शाकाहारी भोजन करते हैं। व्रती के भोजन करने के बाद ही घर के बाकी सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं।

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छठ पूजा का दूसरा दिन- कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन व्रत रखा जाता है। व्रती इस दिन शाम के सयम एक बार भोजन ग्रहण करते हैं। इसे खरना कहा जाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत रखते हैं। शाम को चावल व गुड़ की खीर बनाकर खायी जाती है। चावल का पिट्टा व घी लगी हुई रोटी ग्रहण करने के साथ ही प्रसाद के रूप में भी वितरित की जाती है।

छठ पूजा का तीसरा दिन – कार्तिक श्ुाक्ल षष्ठी के दिन पूरे दिन निर्जला व्रत रखा जाता है। साथ ही छठ पूजा का प्रसाद तैयार करते हैं। इस दिन व्रती शाम के समय किसी नदी, तालाब पर जाकर पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अघ्र्य देते हैं। और रात भर जारगण किया जाता है।

छठ पूजा का चौथा दिन- कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह भी पानी में खड़े होकर उगते हुए सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। अघ्र्य देने के बाद व्रती सात बार परिक्रमा भी करते हैं। इसके बाद एक दूसरे को प्रसाद देकर व्रत खोला जाता है।

खरना के प्रसाद का महत्व

हिंदू मान्यता के अनुसार छठ पूजा के दूसरे दिन खरना व्रत करने से परिवार में सुख शांति बनती है और संतान की प्राप्ति होती है। इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं व्रत कर शाम में स्नान कर रोटी और गुड़ से बनी खीर खाती हैं। खीर एक प्रसाद के रूप में खाया जाता है जो कि मिट्टी के चूल्हे पर आम के पेड़ की लकड़ी जलाकर तैयार किया जाता है। माना जाता है कि गन्ने के रस से तैयार गुड़ खाने से स्किन रोग दूर होता है। साथ ही आंखों का दर्द, शरीर के दाग धब्बे खत्म होते हैं।

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क्यों की जाती है छठ पूजा

सूर्य देव की उपासना के लिए ही छठ पूजा का पर्व मनाया जाता है। सूर्य देव की कृपा से व्यक्ति को मान सम्मान की प्राप्ति होती है और वह जीवन में उच्चाईयां प्राप्त करता है। उसके घर में धन और धान्य की कभी भी कोई कमीं नही होती। इस व्रत को करने से सूर्यदेव की तरह ही श्रेष्ठ संतान जन्म लेती है।

छठ पूजा का महत्व

भगवान सूर्य की आराधना साल में दो बार की जाती है। पहले उनकी पूजा चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि और दूसरी र्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन भगवान सूर्यनारायण की पूजा की जाती है। लेकिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छठ को मुख्य पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन का विशेष महत्व है। छठ पूजा चार दिनों तक की जाती है। जिसे छठ पूजा, डाला छठ, छठी माई, छठ, छठ माई पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा आदि नामों से जाना जाता है।

छठ पूजा में स्नान और दान को विशेष महत्व दिया जाता है। पुराणों के अनुसार लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान राम ने जिस समय राम राज्य की स्थापना की थी उस दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि थी। जिसमें माता सीता और भगवान राम ने व्रत रखा था और भगवान सूर्यनारायण की आराधना की थी। इसके बाद सप्तमी को पुन: एक बार अनुष्ठान कर भगवान सूर्य से आर्शीवाद लिया था

छठ पूजा के बारे में एक और कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की थी। कर्ण भगवान सूर्य के बहुत बड़े भक्त थे। वह रोज कई घंटों तक पानी में खड़े रहकर भगवान सूर्य को अर्ध्य देते थे। सूर्य देव की कृपा से वह एक महान योद्धा बने थे। इसी कारण सूर्य को आज भी अर्ध्य दिया था।