drishti haldwani

चौखुटिया- इनकी गायकी की मुरीद हुई थी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, 2 फरवरी को मनाया जायेगा उत्तराखंड के सुर सम्राट का जन्मदिन

699

चौखुटिया-न्यूज टुडे नेटवर्क-आगामी 2 फरवरी को उत्तराखंड के सुर सम्राट स्व. गोपाल बाबू गोस्वामी जी का जन्मदिन मनाया जायेगा। इस मौके पर उनके परिवार द्वारा विशेष कार्यक्रमों को आयोजन किया जा रहा है। जन्मोत्सव के सभी कार्यक्रम बैराठेश्वर महादेव मंदिर चांदीखेत चौखुटिया में आयोजित किये जायेंगे। इसके लिए सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक रंगारंग कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी जायेंगी। सुर सम्राट स्व. गोपाल बाबू गोस्वामी जी का जन्मदिन उनकी धर्मपत्नी मीरा गोस्वामी, उनके पुत्र गिरीश गोस्वामी, अशोक गोस्वामी, जगदीश गोस्वामी और उत्तराखंड के सुपरस्टार लोकगायक उनके सबसे छोटे पुत्र रमेश बाबू गोस्वामी मना रहे है। उन्होंने सभी लोगों से इस कार्र्यक्रम में पहुंचने की अपील की है। इसके अलावा कार्यक्रम में कई जाने-माने गायक कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे।

iimt haldwani

77वां जन्मदिवस मनायेगा परिवार

यह जानकारी देते हुए उनके सुपुत्र लोकगायक रमेश बाबू गोस्वामी ने बताया कि वह पिछले 20 वर्षो से अपने पिता सुर सम्राट स्व. गोपाल बाबू गोस्वामी जी का जन्मदिवस मनाते आ रहे है। यह उनका 77वां जन्मदिवस है। रमेश बाबू ने बताया कि जन्मोत्सव में उनके पिता के चाहने वाले कई बड़ी-बड़ी हस्तियंा कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने आ रहे है। बता दें कि उत्तराखंड संगीत में पहचान सुर सम्राट स्व. गोपाल बाबू गोस्वामी जी ने दी। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से पहाड़ का दर्द, सुन्दरता, प्रेम आदि को लोगों के सम्मुख रखा। आज सुर सम्राट स्व. गोपाल बाबू गोस्वामी जी कई बड़े लोकगायकों के आदर्श है। आज बड़े-बड़े मचों पर कलाकार उन्हीं के गाये हुए गीतों को गा रहे है।

नौकरी के लिए जगह-जगह भटके गोपाल बाबू

सुर सम्राट गोपाल बाबू गोस्वामी जी उत्तराखण्ड के एक महान गायक थे । वह कुमाऊंनी व गढ़वाली संगती के सबसे पहले गायक थे। उनका जन्म 02 फरवरी 1942 को चांदीखेत चौखुटिया में हुआ था। उनके पिता का नाम स्व. मोहन गिरी गोस्वामी व माता का नाम स्व. चनुली देवी व बहन का नाम राधा देवी था। गोपाल बाबू गोस्वामी ने 5वीं तक की शिक्षा हासिल की थी। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण पढ़ाई आधी में छोडऩे के बाद वह नौकरी की तलाश में दिल्ली व शिमला गये। कई वर्षों तक वहां नौकरी करने के बाद में किन्हीं कारणवश नौकरी छोड़ आये। पिता के इकलौते संतान होने के कारण पिता ने शीघ्र ही उनका विवाह मीरा गोस्वामी के साथ कर दिया गया। इसके बाद वह गांव में खेतीबाड़ी कर अपना जीवनव्यापन करने लगे।

कैले बजे मरूली ने मचा दिया तहलका

इसके कुछ समय बाद उनके पिता का स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनका निधन हो गया। अब घर की सारी जिम्मेदारियां गोपाल बाबू के कन्धों पर आ गयी। एक बार फिर वह रोजगार की तलाश में उधर-उधर भटकने लगे। इसी बीच वर्ष 1970 में सांग एण्ड ड्रामा डेवीजन में उन्हें काम मिल गया। उनकी आवाज ने लोगों का काफी अच्छी लगती थी। इसके बाद शुरू हुए उनके सुरों के जादू ने कभी पीछे हटने का नाम नहीं लिया। उन्होंने समूचे प्रदेश में अपनी गायकी से तहलका मचा दिया। तत्कालीन अविभाजित उत्तर प्रदेश में उनके गानों की धूम मच गई। इसके बाद आकाशवाणी लखनऊ से गाये उनका पहला गीत कैले बजे मरूली ने अपना ऐसा जादू चलाया कि लोग उनके दीवाने हो गये। वर्ष 1976 में एचएमवी कंपनी से पहला ग्रामोफोन रिकार्ड निकला।

कुमाऊं की पहली फिल्म मेघा आ में किया अभिनय

वह एक लेखक, उदघोषक, साहित्यकार, निबन्धकार के रूप में विख्यात हो गये। उन्होंने कुमाऊं की पहली फिल्म मेघा आ में एक गायक और अभिनेता के रूप में कार्य किया। राजुला मालूशाही, हरूहित, रामी बौंराणी जैसी कुछ गाथाएं एवं कुछ पुस्तकें लिखीं। गीतमाला, दर्पण, जीवन ज्योति गीतों को गाथाओं में गाकर इतिहास रच दिया। कुछ गीत आज भी लोगों के जुबां पर गुनगुनाये जाते हैं । जैसे कैले बजै मुसली, हाय तेरी माला, बेडू पाको बारू मासा, पी जाओ पी जाओ मेर पहाड़ का ठन्डों पाणी, नी काटा नी काटा झुगरियाली बांजा, बजाणी धुरा ठन्ड पाणी, घुपती ना बांसा, जै मैंयां दुर्गा भवानी, ओ लाली लाली हौसिया, भुरू भुरू उजाउ हैगो, हिमाला को ऊचों डाना गीत शामिल है। इसके अलावा उनके विवाह अमर गीत जा चेली जा सुरास जैसे गीतों से नई पहचान बनाई।

तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी भी हुई गीतों की मुरीद

उनकी गायकी अपने चरम पर थी। तत्कालीन उत्तर प्रदेश में पहाड़ से सिर्फ एक ही नाम था गोपाल बाबू गोस्वामी। उनकी गायिकी से प्रभावित होकर हिन्दी जगत से राजश्री फिल्म प्रोडक्शन न उन्हें पत्र भेजा कि वह अपनी सेवा हिन्दी जगत को दे। लेकिन उन्होंने मना कर दिया कहा वह सिर्फ देवभूमि के लिए गायेंगे। उनके गीतों से तत्कालीन प्रधानमंत्री इतनी प्रभावित हुई की उन्होंने उनके नाम एक बधाई पत्र भेज दिया और उन्हें शुभकामनाएं दी। कुछ वर्षों बाद गोपाल बाबू बीमार रहने लगे उन्हें ब्रेन ट्यूमर हो गया। जिसके बाद बीडी पाण्डे चिकित्सालय में उनका इलाज चला लेकिन इस महान कलाकार ने 26 नवम्बर 1996 को इस संसार से अलविदा दिया। उत्तराखण्ड ने सुरों के बादशाह को खो दिया। आज भी गोस्वामी जी सभी के दिलों में जिन्दा हैं व सदा रहेंगे । गोस्वामी जी का यह योगदान न भुलाये जाने वाला रहेगा।

पुत्र संवार रहा विरासत

कहते है कुछ चीजें बच्चाों को उनके विरासत से मिलती है। यही उनके छोटे पुत्र रमेश बाबू गोस्वामी के साथ हुआ। भगवान ने उन्हें सुरीली आवाज दी। इसी आवाज की बदौलत वह चल दिये अपनी पिता की विरासत को संभालने। गायकी के क्षेत्र में कदम रखते ही उनके गानों ने धूम मचा दी। पिता की सुरीली आवाज उनसे मिलती है। आज के दौर में अपने गानों से रमेश बाबू गोस्वामी सुपरस्टार लोकगायकों की श्रेणी में खड़े हो गये। उनकी सुरीली आवाज मंचों पर उनके पिता स्व. गोपाल बाबू की याद दिलाती है। वही अपने पिता के गाने गोपूली को एक नया रूप देकर रमेश बाबू ने गायकी के क्षेत्र में अपनी आवाज से तहलका मचा दिया। इस गीत को अभी तक 52 लाख से ऊपर लोग सुन चुके है। इसके बाद रमेश बाबू ने एक के बाद एक गानों समूचे उत्तराखंड ही नहीं विदेशों में भी धूम मचा दी।