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बरेली- आईएएस वीरेन्द्र कुमार ने किया अप्रतिम हिन्दी गीत शतक का संपादन, देखिये युवाओं को कैसे दे रहे हैं सीख

बरेली-हाल ही में वीरेन्द्र कुमार सिंह के सम्पादन में नयी किताब प्रकाशन नई दिल्ली से एक गीत संचयन अप्रतिम हिन्दी गीत शतक प्रकाशित हुआ है। हिंदी के सभी कालखंडों के लोकप्रिय गीत एक ही पुस्तक में उपलब्ध होने से यह एक विशिष्ट संकलन बन गया है। बता दें कि वीरेन्द्र कुमार सिंह आईएएस अधिकारी के साथ-साथ कलाप्रेमी एवं साहित्यकार हैं। वह मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर हैं। इससे पहले वह वर्ष 2018-19 में बरेली के जिलाधिकारी रह चुके थे। अपने डेढ़ साल के कार्यकाल के दौरान आईएएस वीरेन्द्र कुमार सिंह ने बरेली नगर के सांस्कृतिक उत्थान के लिए उन्होंने जो कार्य किए वे अविस्मरणीय हैं।

इससे पहले उनका एक कविता संग्रह कोई शोर नहीं होता, प्रकाशित हो चुका है। वे हरिश्चन्द्र पाण्डे के कविता संग्रह एक बुरुंश कहीं खिलता है का अंग्रेजी में अनुवाद कर चुके हैं। उन्होंने वर्ष 2002 से 2013 तक अप्रतिम साहित्य वार्षिकी के छह अंकों का संपादन किया था। अप्रतिम हिन्दी गीत शतक में हिंदी के जिन महान साहित्यकारों के गीत पुस्तक में संग्रहीत हैं उनमें जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, सोहनलाल द्विवेदी, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंश राय बच्चन, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरि औध, उदयशंकर भट्ट, रामधारी सिंह दिनकर, रामेश्वर शुक्ल अंचल, शिवमंगल सिंह सुमन, केदारनाथ अग्रवाल, कन्हैयालाल नंदन, गोपाल सिंह नेपाली, जानकीवल्लभ शास्त्री, धर्मवीर भारती, शमशेर बहादुर सिंह, शैलेंद्र, दुष्यंत कुमार तथा सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के नाम शामिल हैं।

पुस्तक की भूमिका में आईएएस वीरेन्द्र कुमार सिंह ने लिखा है। इन चयनित गीतों के माध्यम से हम अपने समय और समाज की पूरी पहचान और पड़ताल कर सकते है। फलस्वरुप पराधीनता का समय, स्वाधीनता का समय, राष्ट्र निर्माण का समय, विभिन्न संकटों और परिवर्तनों का समय सब इन गीतों में बखूबी चित्रित एवं प्रतिबिंबित है। इस संकलन के गीतों के कला पक्ष पर भी कुछ चर्चा आवश्यक है। प्राय: अधिकांश गीत छंद के अनुशासन और गेयता तथा लयात्मकता की शर्तों को पूर्ण करते हैं। स्वतंत्र गीतों के साथ ऐसे गीत भी पर्याप्त संख्या में हैं जो किसी महाकाव्य, खंडकाव्य अथवा लंबी रचना के अंश हैं यथा प्रिय प्रवास, नूरजहां, आंसू, हल्दीघाटी, श्वंशी और मादल आदि। गीतों के आकार में भी पर्याप्त विविधता है। एक ओर झांसी की रानी, श्विहग कुमार, सतपुड़ा के जंगल, पांच जोड़ा बांसुरी जैसे लंबे गीत हैं तो श्वीणा वादिन, मेघ कृपा, पुष्प की अभिलाषा सदृश लघु कलेवर के सशक्तगीत भी।

संकलन में कुछ ऐसे गीत भी हैं जिन्हें पढक़र कई पाठकों को अपने छात्र जीवन का स्मरण हो आएगा। ऐसा ही एक गीत द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का है-
यदि होता किन्नर नरेश मैं
राजमहल में रहता।
सोने का सिंहासन होता
सिर पर मुकुट चमकता।
बंदीजन गुण गाते रहते
दरवाजे पर मेरे।
प्रतिदिन नौबत बजती रहती
संध्या और सवेरे।
मेरे वन में सिंह घूमते
मोर नाचते आंगन।
मेरे बागों में कोयलिया
बरसाती मधु रस-कण।

गोपाल सिंह नेपाली का यह गीत भी कभी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जाता था-
यह लघु सरिता का बहता जल
कितना शीतल, कितना निर्मल!
हिमगिरि के हिम से निकल-निकल
यह है विमल दूध-सा हिम का जल
कर-कर निनाद कलकल-छलछल
बहता आता नीचे पल-पल
तन का चंचल, मन का विह्वल
यह लघु सरिता का बहता जल!

अधिकांश लोग निरंकारदेव सेवक को बाल साहित्यकार के रूप में ही जानते हैं। कम लोगों को पता है कि उन्होंने बड़ों के लिए भी उत्कृष्ट गीत लिखे थे। उन्हीं में से एक गीत इस संकलन में सम्मिलित है जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-

चला जाता वह विहग कुमार
शून्य नीले नभ में निश्चिन्त हिलाता पंखों के पतवार।
तपस्वी संन्यासी-सा धीर, हृदयगत भावों तल्लीन
विरत वैरागी-सा विद्वान, कल्पना-सा कवि की स्वाधीन।
अखिल भव चिंताओं से दूर, चहकता एकाकी चुपचाप
हृदय का ओस-बिंदु सा स्वच्छ, विचारों में निर्भय निष्पाप।
क्षितिज पर कहीं जमाये दृष्टि, सरलता की प्रतिमा साकार
चला जाता वह विहग कुमार।

निरंकार देव सेवक के अलावा बरेली के तीन प्रसिद्ध साहित्यकारों किशन सरोज, ज्ञानवती सक्सेना तथा रमेश गौतम के प्रतिनिधि गीत भी इस पुस्तक में संकलित हैं।

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