धरती का बैकुंठ है बद्रीनाथ धाम, एक बार जरूर करें भवगवान विष्णु की नगरी की यात्रा, बहुत कुछ खास है यहां पर

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देहराूदन -न्यूज टुडे नेटवर्क : उत्तराखंड राज्य में स्थित नर नारायण की गोद में बसा बद्रीनाथ नीलकण्ड पर्वत का पाश्र्व भाग है जो पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है। हिंदू धर्म के मानने वालों की संख्या बहुतायत में है इसलिये हिंदुओं की आस्था के केंद्र भी अधिक मिलते हैं। उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम चारों दिशाओं में चार धाम हिंदूओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। इन्हीं में एक धाम है बद्रीनाथ। इस मंदिर में आप भगवन विष्णु के साथ माता लक्ष्मी, कुबेर जी, उद्धव जी, गरुड़ जी, नारद जी आदि की मूर्तियां देख सकते हैं। हर साल हजारों की तादाद में भक्तों की भीड़ उमड़ती है सब ऊँची नीची पहाडिय़ों को पार कर भगवान के दर्शन करने आते हैं। यहां से आप सूर्योदय और सूर्यास्त का अद्भुत नजारा कर सकते हैं।आइये आपको बताते हैं भगवान विष्णु के इस मंदिर बदरीनाथ की कहानी।

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क्यों कहते हैं बदरीनाथ

नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित भगवान विष्णु के इस धाम के आस-पास एक समय में जंगली बेरी बद्री प्रचुर मात्रा में पाई जाती थी इसी बद्री के नाम पर इस धाम का नाम बद्रीनाथ पड़ा। वहीं बद्रीनाथ नाम होने के पिछे एक कथा भी प्रचलित है कहा जाता है कि भगवान विष्णु तपस्या में लीन थे कि भयंकर हिमपात होने लगा। हिमपात के कारण भगवान विष्णु भी पूरी तरह हिम में डूब चुके थे। तब माता लक्ष्मी से उनकी यह दशा सहन न हो सकी और उनके समीप ही एक बेरी यानि बदरी के वृक्ष का रुप लेकर उन्हें धूप, वर्षा और हिम से बचाने लगी। कालांतर में जब भगवान विष्णु ने आंखे खोली तो देखा की मां लक्ष्मी स्वयं हिम से ढकी हुई हैं। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी के तप को देखते हुए कहा कि आपने भी मेरे समान ही तप किया है इसलिये इस धाम को मुझे तुम्हारे साथ पूजा जायेगा साथ ही उन्होंने कहा चूंकि आपने बदरी वृक्ष का रूप धारण कर मेरी रक्षा की है इसलिये मुझे भी बदरी के नाथ यानि बदरीनाथ के नाम से जाना जायेगा।

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छह महीने तक नारद करते हैं पूजा

बद्रीनाथ धाम के कपाट सर्दियों के मौसम में बंद रहते हैं। कहते हैं मंदिर के कपाट बंद होने के बाद फिर छह मास तक देवर्षि नारद भगवान की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि मंदिर के कपाट बंद करते समय जो ज्योति जलाई जाती है वह कपाट खुलने के बाद भी वह जलती हुई मिलती है।

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नर और नारायण की कहानी

नर और नारायण नाम के जिन दो पर्वतों के बीच बद्रीनाथ धाम स्थित है इनकी भी अपनी कहानी हैं और पौराणिक ग्रंथों में अलग-अलग कहानियों के उल्लेख मिलते हैं। इन्हें साक्षात विष्णु का अवतार माना जाता है जो ब्रह्मा के पुत्र धर्म की पत्नी से पैदा हुए। माना जाता है कि यहां पर इन्होंनें जगत के कल्याण के लिये कठोर तप किया। केदारनाथ में शिवलिंग की स्थापना भी नर और नारायण द्वारा किये जाने की मान्यता है। भगवान विष्णु ने नर और नारायण के रुप में अवतार लिया और यहां तपस्या करने लगे। मान्यता है कि बद्रीनाथ धाम में की गई तपस्या का फल भी हजारों साल की तपस्या जितना मिलता है।

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बद्रीनाथ मंदिर

बद्रीनारायण के नाम से जाना जाने वाला विशाल आस्थाओं से सराबोर बद्रीनाथ मंदिर मोक्ष प्राप्ति का मुख्य द्वार है। यहां चार धामों में से एक धाम भी है।

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भीम पुल

विशाल चट्टान द्वारा प्राकृतिक रूप से बना पुल भीम पुल कहलाता है जो कि सरस्वती नदी के ऊपर से निकला है। यहां गणेश गुफा, व्यास गुफा आदि भी दर्शनीय है। पर्यटक यहां इस पुल के साथ साथ इन गुफाओं के भी दर्शन करने आते हैं।

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वसुधरा

वसुधरा झरना बेहद लुभावना व मनोरम दृश्यों वाला है। हालांकि इस झरने तक पहुँचने वाला रास्ता बेहद कठिन व साहसपूर्ण है यहां तक आना किसी जोखिम को उठाने जैसा है। परन्तु यहाँ का वातावरण पर्यटकों को यहाँ आने से रोक नहीं पाता है।

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सतोपंत झील

सतोपंत झील तकरीबन 1 किलोमीटर के दायरे में फैली हुई बेहद लुभावनी झील है। हालांकि यहाँ तक पहुँचने के लिए पर्यटकों को पैदल ही यात्रा करनी पड़ती है क्यूंकि यहाँ तक आने के लिए गाड़ी घोड़ों की व्यवस्था नहीं है।

खिरौं घाटी

खिरौं घाटी का सौंदर्य इतना निखरा हुआ रहता है की यहाँ तक आने के लिए पर्यटक खतरनाक रास्तों की भी परवाह नहीं करते हैं। हालांकि यहाँ तक बस पैदल ही आया जा सकता है। जो पर्यटक ट्रेकिंग के शौकीन हैं वह यहाँ अवश्य आएं।

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कागभुशुंडि ताल

कागभुशुंडि ताल तक पहुँचने के लिए भी पैदल ही यात्रा करनी पड़ती है क्यूंकि यहां पर भी कोई साधन उपलब्ध नहीं है। यहाँ ट्रेकिंग करने का अपना अलग ही मजा है।

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पांडुकेश्वर

कहा जाता है कि पांडुकेश्वर महाभारत कालीन से जुड़ा हुआ है इसी वजह से इस स्थान का अपना अलग ऐतिहासिक महत्त्व है। यहीं पास में दो मंदिर भी हैं जो कलात्मक शैली के अद्भुत धरोहर हैं।

कैसे पंहुचे बद्रीनाथ

हरिद्वार, ऋषिकेश, रुद्रप्रयाग से होते हुए बद्रीनाथ धाम पंहुचा जा सकता है, लेकिन वहां का मौसम बहुत ठंडा होता है इसलिये पूरी तैयारी के साथ जाना चाहिये। ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम की दूरी 295 किलोमीटर की है। साथ ही सर्दियों में बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद रहते हैं और पूरा क्षेत्र निर्जन रहता है इसलिये सर्दियों के समय बद्रीनाथ की यात्रा नहीं की जाती मई महीने से लेकर नवबंर तक बद्रीनाथ धाम की यात्रा के लिये विशेष प्रबंध किये जाते हैं।

ऋषिकेश -297 किमी.
देहरादून –314 किमी.
कोटद्वार- 327 किमी.
दिल्ली –395 किमी.

कहां रुकें

बद्रीनाथ और जोशीमठ दोनों स्थानों पर तीर्थयात्रियों के रुकने हेतु विभिन्न प्रकार के होटल और धर्मशालाएं सस्ती दर पर उपलब्ध है।

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