बरेली के राजश्री मेडिकल कॉलेज व पाथ संस्‍था के सहयोग से फाइलेरिया से बचाव के लिए आयोजित हुआ सेमिनार

चिकित्सकों ने विद्यार्थियों को बताये फाइलेरिया के लक्षण और बचाव के तरीके

 

न्‍यूज टुडे नेटवर्क | बरेली के राजश्री  मेडिकल कॉलेज  के सभागार में मंगलवार को पाथ संस्था के सहयोग से फाइलेरिया पर सेमिनार का आयोजन किया गया।  सेमिनार में राजश्री मेडिकल कॉलेज  और पाथ संस्था के चिकित्सकों के साथ ही मेडिकल के विद्यार्थियों ने  प्रतिभाग किया।

मेडिकल कॉलेज  के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. डॉ. वी.के अग्रवाल  ने कहा कि फाइलेरिया  बीमारी  क्यूलेक्स और मैनसोनाइडिस प्रजाति के मच्छरों से होती है। यह मच्छर जब किसी मानव को काटता है तो यह एक पतले धागे जैसा परजीवी मानव शरीर में छोड़ता है। मादा परजीवी, नर परजीवी के संपर्क में आकर लाखों सूक्ष्म फाइलेरिया नामक भ्रूणों को जन्म देती है। यह माइक्रो फाइलेरिया रात के समय में प्रभावी होते हैं। उन्होंने कहा कि फाइलेरिया बीमारी एक छिपा  हुआ दुश्मन है, क्योकि इसके लक्षण संक्रमण के  7-8 सालों बाद कई बार तो 10-12 सालों बाद नजर आते हैं। ऐसी स्थिति में मानव शरीर के अंगों हाथ, पैर, स्तन, अंडकोष में सूजन बढ़ने लगती है।

प्रो. डॉ. जम्पाला श्रीनिवास माइक्रोबॉयलॉजी विभाग के सहायक ने  क्यूलेक्स और मैनसोनाइडिस प्रजाति के मच्छरों के जीवन चक्र की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह बीमारी मच्छरों द्वारा फैलती है, खासकर परजीवी क्यूलेक्स फैंटीगंस मादा मच्छर के जरिए।

इंटरनल मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) डब्लू .पी सिंह ने कहा  फाइलेरिया दुनिया की दूसरे नंबर की ऐसी बीमारी है जो बड़े पैमाने पर लोगों को दिव्यांग बना रही है। उन्होंने कहा कि जिन अंगों पर फाइलेरिया का प्रभाव होता है, उसकी त्वचा पर इसके जीवाणु तेजी से पनपते है। इन जीवाणुओं की संख्या अधिक होने के कारण प्रभावित अंगों में दर्द, लालपन एवं रोगी को बुखार हो जाता है। फाइलेरिया प्रभावित अंगों में शुरूआत में सूजन के लक्षण होते हैं, बाद में यही सूजन स्थायी और लाइलाज हो जाती है। उन्होंने कहा कि इस बीमारी की वजह से किसी की मौत भले ही न हो, लेकिन इस बीमारी से व्यक्ति मृत के समान हो जाता है।

डॉ.  शोएब अनवार पाथ संस्था के सीनियर प्रोग्राम ऑफिसर  ने कहा  - जब तक किसी व्यक्ति के फाइलेरिया से पीड़ित होने का पता चलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। दुर्भाग्य की बात यह भी है कि इस बीमारी का कोई कारगर इलाज नहीं है। इसकी रोकथाम ही इसका समाधान है। उन्होंने कालाजार बीमारी के बारे में भी जानकारी देते हुए इसके कारण, लक्षण और उपचार के बार में बताया।

उन्होंने बताया  फाइलेरिया के उन्मूलन के लिए केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय फाइलेरिया उन्मूलन  कार्यक्रम चलाया जा रहा है। फाइलेरिया परजीवी की औसतन आयु 4 से 6 वर्ष की होती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को  अभियान के दौरान पांच सालों तक लगातार फाइलेरिया से बचाव की दवा खानी चाहिए, जिससे कि वह फाइलेरिया जैसी घातक बीमारी से बच सके।

डॉ. शोएब अनवर ने बताया कि सामान्य लोगों में, जिनके शरीर में फाइलेरिया रोग  के कीटाणु नहीं है, दवा के सेवन से कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। दवा के सेवन से जब शरीर में फाइलेरिया कृमि मरते हैं तो बुखार, खुजली, उल्टी जैसे लक्षण हो सकते हैं जो स्वतः तीन से चार घंटे में समाप्त हो जाते हैं। इस लक्षण के होने पर इसका सामान्य इलाज किया जा सकता है। इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है। हाइड्रोसिल का इलाज संभव है इसके मुफ्त  ऑपरेशन की सुविधा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र एवं जिला अस्पताल पर  उपलब्ध है। इससे बचाव के लिए घर के आस-पास पानी जमा न होने दें और सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें। उन्होंने यह भी बताया कि यह दवा दो वर्ष से कम बच्चों, गर्भवती और अत्यन्त गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों को नहीं दी जानी है, लेकिन जो लोग उच्च रक्त चाप, मधुमेह, अर्थराइटिस रोग की दवा का सेवन कर रहे हैं, वह इस दवा का सेवन कर सकते हैं |

डा. दीपक प्रोग्राम ऑफिसर  पाथ संस्था ने बताया -  कालाज़ार जो कि सैंडफ्लाई (बालू मक्खी ) से फैलने वाली एक जानलेवा बीमारी है।  अभी तक यह  माना जाता था कि यह बीमारी समाप्त होने की कगार पर है किन्तु हालिया वर्षों में यह बीमारी गोंडा, बहराइच, लखीमपुर खेरी जैसे जनपदों में भी  पाई गयी है ।

कालाज़ार के रोगी में दो सप्ताह से अधिक समय का बुखार, तिल्लियों एवं यकृत के बढ़ने के कारण पेट में सूजन एवं दुर्बलता आ जाती है । एक अन्य प्रकार का कालाज़ार जिसे पी.के.डी.एल कहते हैं वह भी इन जनपदों में पाया गया है । यह जानकारी सीएफएआर आर्गेनाइजेशन बरेली की ओर से रूबी ने दी।