Uttarakhand Weather - उत्तराखंड में मौसम का कहर, भारी बारिश, ओलावृष्टि और तेज हवाओं का अलर्ट, 24 घंटे रहें सतर्क

 

Uttarakhand Weather - उत्तराखंड में मौसम ने एक बार फिर करवट ली है। मौसम विभाग ने राज्य के अधिकांश पर्वतीय क्षेत्रों में गरज-चमक के साथ बारिश, ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी और तेज हवाएं चलने की चेतावनी जारी की है। 3500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हिमपात की संभावना जताई गई है, जबकि पहाड़ी जिलों में 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चल सकती हैं। मौसम विभाग ने अगले 24 घंटों के लिए देहरादून, टिहरी, नैनीताल, चंपावत, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों में भारी बारिश को लेकर ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। वहीं उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ के कुछ क्षेत्रों में ओलावृष्टि की भी चेतावनी दी गई है। मैदानी जिलों में आकाशीय बिजली गिरने और तेज हवाओं के मद्देनजर येलो अलर्ट प्रभावी रहेगा।

दिनांक 31.05.2026 को उत्तराखंड राज्य के लिए जारी मौसम पूर्वानुमान एवं चेतावनी I pic.twitter.com/16Petxlf7L

— Meteorological Centre Dehradun (@mcdehradun) May 31, 2026


प्रशासन ने यात्रियों और स्थानीय नागरिकों से मौसम सामान्य होने तक अनावश्यक यात्रा से बचने तथा केवल आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करने की अपील की है। किसी भी आपात स्थिति में सहायता के लिए जिला प्रशासन ने हेल्पलाइन नंबर 8958757335 और 8218326386 जारी किए हैं। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से प्रदेश के कई हिस्सों में अगले कुछ घंटों तक मौसम का प्रभाव बना रह सकता है। हालांकि इससे तापमान में गिरावट आएगी और लोगों को भीषण गर्मी से राहत मिलने की संभावना है।

मानसून की दस्तक में हल्की देरी - 
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने पहले जून से पूर्व मानसून के केरल तट पर पहुंचने की संभावना जताई थी, लेकिन मॉन्सूनी हवाओं के कमजोर पड़ने से इसके आगमन में कुछ दिनों की देरी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार बंगाल की खाड़ी के ऊपर विकसित हो रहे चक्रवाती तंत्र का असर मॉन्सून की गति पर पड़ा है। हालांकि मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह स्थिति चिंता का विषय नहीं है और अगले दो से तीन दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के अरब सागर, लक्षद्वीप और बंगाल की खाड़ी के अन्य हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल बनी हुई हैं। गौरतलब है कि देश की 70 प्रतिशत से अधिक वार्षिक वर्षा मानसून के दौरान होती है, जिससे कृषि, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है।