Diwakar Bhatt - अलविदा फील्ड मार्शल, उत्तराखंड राज्य आंदोलन के अग्रणी नेता दिवाकर भट्ट, जानिए उनके प्रमुख आंदोलन और संघर्षगाथा
Diwakar Bhatt Death - उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रखर सेनानी, उक्रांद के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष और प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट का मंगलवार को हरिद्वार स्थित शिवालोक कॉलोनी में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थे और पिछले वर्षों में पाँच ब्रेन स्ट्रोक झेल चुके थे। उनके निधन से पूरे उत्तराखंड में शोक की गहरी लहर दौड़ गई है। दिवाकर भट्ट को आंदोलन के दौरान उनके संघर्ष, तेवर और नेतृत्व क्षमता के लिए “उत्तराखंड फील्ड मार्शल” की उपाधि प्राप्त हुई थी, जिसे 1993 में आंदोलन के जननायक इंद्रमणि बडोनी ने प्रदान किया था। उत्तराखंड की अस्मिता, पहाड़ की पीड़ा और क्षेत्रीय असमानताओं के मुद्दे उठाने में उनका योगदान अविस्मरणीय माना जाता है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन -
दिवाकर भट्ट का जन्म 1 अगस्त 1946 को सुपार गांव, पट्टी बडियार गढ़, टिहरी गढ़वाल में हुआ। वे लंबे समय से हरिद्वार में निवासरत थे। 1965 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रताप सिंह नेगी के नेतृत्व में पहली बार उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े, जिसके बाद उनका जीवन पूरी तरह संघर्ष और संगठन निर्माण को समर्पित हो गया। 1976 में उन्होंने ‘उत्तराखंड युवा मोर्चा’ की स्थापना की, जिसने आगे चलकर राज्य आंदोलन को नई दिशा प्रदान की। 1980 से वे लगातार तीन बार कीर्तिनगर ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए।
प्रमुख आंदोलन और संघर्ष -
1995 का श्रीयंत्र टापू आंदोलन – राज्य आंदोलन का निर्णायक अध्याय माना जाता है।
खैट पर्वत उपवास (1995) – 80 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी सुंदर सिंह के साथ खैट पर्वत की कठिन चढ़ाई कर दिया गया उपवास, जिसने केंद्र सरकार को वार्ता के लिए मजबूर कर दिया था।
1994 के नैनीताल–पौड़ी के जनांदोलन – राज्य निर्माण, वन कानूनों में संशोधन, क्षेत्रफल आधारित आरक्षण, हिल कैडर व अन्य मांगों के लिए व्यापक आंदोलन संगठित किया। उनका दिया नारा “घेरा डालो – डेरा डालो” आंदोलन की पहचान बन गया।
राजनीतिक जीवन -
2007 में दिवाकर भट्ट देवप्रयाग विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए और राज्य सरकार में राजस्व एवं खाद्य आपूर्ति मंत्री बने। मंत्री रहते हुए भी वे पहाड़ की समस्याओं, पलायन और विकास असमानता के मुद्दों पर लगातार मुखर रहे। दिवाकर भट्ट के निधन से राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में शोक की लहर है। उत्तराखंड आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और आम जनता ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी और कहा कि उनका जाना केवल एक नेता का निधन नहीं, बल्कि एक युग का अंत है। दिवाकर भट्ट का संघर्ष, उनकी आवाज और पहाड़ के प्रति उनका समर्पण हमेशा उत्तराखंड की चेतना में जीवित रहेगा।