देहरादून - उत्तराखंड शहरी विभाग में क्लर्क, सफाई निरीक्षक और कर कर्मचारियों को बनाया प्रभारी ईओ, आदेशों से मचा विवाद

 

 

 

देहरादून - उत्तराखंड के शहरी विकास निदेशालय द्वारा नगर निकायों में क्लर्क, सफाई निरीक्षक, कर निरीक्षक और लेखा कर्मचारियों को प्रभारी अधिशासी अधिकारी (ईओ) नियुक्त किए जाने के आदेश के बाद प्रशासनिक और कानूनी हलकों में हलचल मच गई है। विभाग की ओर से जारी आदेशों में विभिन्न नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में कई कर्मचारियों को प्रभारी ईओ की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसी को लेकर उत्तराखंड बेरोजगार संघ ने आज शहरी निदेशालय में धरना दिया। संघ ने आरोप लगाया की 15 से 20 में इन पदों की रेवड़ियां बांटी गई हैं। 

जानकारी के अनुसार, शहरी विकास विभाग के पास लगभग 60 नियमित अधिशासी अधिकारी हैं, जिनमें से कई को नगर निगमों में तैनात किया गया है। इससे नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों में ईओ के पद रिक्त हो गए, जिन्हें भरने के लिए विभाग ने अन्य संवर्गों के कर्मचारियों को प्रभारी ईओ नियुक्त कर दिया।

अपर सचिव एवं निदेशक शहरी विकास विनोद गिरी गोस्वामी के नाम से जारी आदेशों के तहत सतीश कुमार, हेमंत कुमार गुप्ता, गुरमीत सिंह, रोशन सिंह पुंडीर, तारिक खान, सरोज गौतम, पूजा, अंकित राणा, कुलदीप चौहान, यशवीर सिंह, दीपक बुडलाकोटि, भरत पंवार, कुलदीप नैथानी, राकेश कोटिया, कुसुम मटूडा, वासुदेव डंगवाल, पंकज सिंह और प्रेम सिंह रावत समेत कई कर्मचारियों को अलग-अलग निकायों में प्रभारी ईओ बनाया गया है।

नियमों पर उठे सवाल - 
इन नियुक्तियों को लेकर विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सफाई निरीक्षक या अन्य लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारी अपने नियमित सेवा क्रम में अधिशासी अधिकारी के पद तक नहीं पहुंच सकते। उत्तराखंड स्थानीय निकाय (केंद्रीकृत) सेवा नियमावली-2019 के अनुसार ईओ पद पर नियुक्ति पदोन्नति अथवा उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के माध्यम से ही की जानी चाहिए। वहीं, उत्तर प्रदेश के वर्ष 2017 के आदेश के अनुसार प्रभारी ईओ का दायित्व केवल एसडीएम स्तर के अधिकारी को सौंपने का प्रावधान बताया जाता है, जिसका उत्तराखंड में भी लंबे समय से पालन होता रहा है।

हाईकोर्ट पहले भी जता चुका है चिंता - 
इस मामले में नैनीताल हाईकोर्ट भी पूर्व में सरकार को निर्देश दे चुका है। दो मई 2025 को न्यायालय ने प्रदेश के नगर निकायों में कर्मचारियों की कमी और प्रभारी व्यवस्था पर सुनवाई करते हुए सचिव शहरी विकास को चार माह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि बड़ी संख्या में लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारियों को महत्वपूर्ण पदों का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने से निकायों का प्रशासनिक कार्य और आम जनता को मिलने वाली बुनियादी सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।


शहरी विकास मंत्री राम सिंह कैड़ा ने नियुक्तियों का बचाव करते हुए कहा कि यह व्यवस्था नई नहीं है। उनके अनुसार, "जो अधिकारी पहले भी प्रभारी ईओ के रूप में कार्य कर चुके हैं, उन्हें ही दोबारा जिम्मेदारी दी गई है। विभाग में अधिशासी अधिकारियों के कई पद रिक्त हैं, इसलिए प्रशासनिक आवश्यकता को देखते हुए यह व्यवस्था की गई है।"

इन नियुक्तियों ने एक बार फिर नगर निकायों में नियमित अधिशासी अधिकारियों की कमी, भर्ती प्रक्रिया और सेवा नियमों के पालन को लेकर बहस तेज कर दी है।