उत्तराखंड में एक ऐसा स्थान जहां देवी सरस्वती व उनकी वीणा के होते है साक्षात दर्शन…. यहां हुई थी महाभारत ग्रन्थ की रचना

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देहरादून -न्यूज टुडे नेटवर्क : ज्ञान और विद्या की देवी सरस्वती जिन्हें वीणापाणी के नाम से भी जाना जाता है, उनकी विशेष पूजा का पर्व हर वर्ष बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस लिए इसे सरस्वती पूजनोत्सव दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इस साल बसंत पंचमी 10 फरवरी रविवार को है। भारत में एक ऐसा स्थान भी है जहां देवी सरस्वती के साक्षात दर्शन किए जा सकते हैं, और उनकी वीणा के तार देख सकते हैं।

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पर्वतों के बीची सरस्वती नदी

बद्रीनाथ धाम से करीब 3 किमी दूर माणा गांव है। इस गांव को भारत चीन सीमा का आखिर गांव कहा जाता है। यहीं पर्वतों के बीच से सरस्वती नदी का उद्गम हुआ है। पुराणों में जिक्र आया है कि एक शाप के कारण गंगा, यमुना और देवी सरस्वती को नदी रूप में धरती पर आना पड़ा।

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दर्शन मात्र से ही मिलता है पुण्य

सरस्वती नदी के उद्गम स्थल पर देवी सरस्वती का एक मंदिर है। ऐसी भी मान्यता है कि देवी सरस्वती जब सृष्टि में प्रकट हुई थीं तो इस स्थान पर इनका प्रकट्य हुआ था। इस लिए मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सरस्वती की प्रतिमा के दर्शन से साक्षात देवी सरस्वती के दर्शन का पुण्य मिलता है।

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मुनि व्यास ने की थी रचना

यहां सरस्वती नदी की धारा में जब सूर्य की रोशनी पड़ती है तो इंद्र धनुष के सातो रंग दिखने लगते हैं। कहते हैं कि ये देवी सरस्वती की वीणा के तार और सातों सुर हैं। मां सरस्वती के हाथ में जो वीणा है, उसके सात सुरों से ही संसार मेें संगीत आया है और जीव जन्तुओं को वाणी मिली है। सरस्वती के उद्गम स्थल के पास ही व्यास गुफा भी है जहंा रहकर व्यास मुनि ने महाभारत ग्रन्थ की रचना की थी। यहीं पास में गणेश महाराज की भी गुफा है। कहते हैं कि इसी गुफा में रहकर गणेश जी ने महाभारत लिखने में व्यास जी की सहायता की थी।

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