बुंदेलखंड का जालियांवाला बाग, 21 सेनानी हुए थे शहीद

भोपाल, 6 अगस्त (आईएएनएस)। भारत आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस मौके पर हम स्वतंत्रता संग्राम के कई उन पहलूओं, और वीर योद्धाओं को याद कर रहे हैं जिन्हें इतिहास की किताओं में उचित स्थान नहीं मिला। ऐसी ही एक लड़ाई है बुंदेलखंड की।
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बुंदेलखंड का जालियांवाला बाग, 21 सेनानी हुए थे शहीद भोपाल, 6 अगस्त (आईएएनएस)। भारत आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस मौके पर हम स्वतंत्रता संग्राम के कई उन पहलूओं, और वीर योद्धाओं को याद कर रहे हैं जिन्हें इतिहास की किताओं में उचित स्थान नहीं मिला। ऐसी ही एक लड़ाई है बुंदेलखंड की।

आजादी की लड़ाई में बुंदेलखंड के लोगों ने भी बड़े पैमाने पर शहादत दी थी और यहां के छतरपुर जिले के चरण पादुका स्थल को तो ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंट फिशर ने जलियांवाला बाग जैसा लहूलुहान कर दिया था।

बात मकर संक्रांति के दिन 14 जनवरी 1931 की है, जब छतरपुर जिले के चरण पादुका स्थल पर स्थानीय शासन द्वारा लगाए गए करों के विरोध में हजारों लोग जमा हुए थे। यह एक व्यापक आंदोलन था जिसके नायक या नेतृत्वकर्ता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित राम सहाय तिवारी और हीरा सिंह को पुलिस ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया था, मगर आंदोलन की आग नहीं थमी थी।

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उपलब्ध तथ्य बताते हैं कि मकर संक्रांति के दिन 14 जनवरी 1931 को बड़ी संख्या में आंदोलन की रणनीति बनाने के लिए लोग जमा हुए। तभी ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंट फिशर ने आंदोलनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया, इस गोलीकांड में 21 सेनानी शहीद हो गए, वहीं बड़ी संख्या में लोग घायल हुए।

यह घटना जलियांवाला कांड की याद दिलाती है क्योंकि इसी तरह जलियांवाला बाग में बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को रॉलेट एक्ट का विरोध करने वालों पर जनरल डायर ने गोलियां चलवाई थी जिसमें 400 से ज्यादा लोग शहीद हुए थे।

चरण पादुका गोलीकांड अब भी यहां के लोगों की याद में समाया हुआ है। यह चरण पादुका स्थल उर्मिल नदी के तट पर स्थित है और जब फायरिंग हुई थी तब अनेक लोग नदियों में कूद गए थे और नदी का पानी भी लाल हो गया था। यह वही स्थान है जहां 14 जनवरी को मेला लगता है और हजारों लोग शहीदों को श्रद्धांजलि भी देते हैं।

बुंदेलखंड के वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास कहते हैं कि शहीदों की चिताओं पर हर वर्ष लगेंगे मेले जैसी स्थिति है चरण पादुका की, जहां मकर सक्रांति के दिन एक मेला लगता है और राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों से जुड़े लोग श्रद्धांजलि देने आते हैं। इस स्थान को राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर कोई पहचान नहीं मिल पाई है, बातें खूब होती हैं मगर इस स्थल को प्रेरणादाई स्थल बनाने की कोई सार्थक पहल नहीं हुई।

देश में 1930 के दौर में महात्मा गांधी का असहयोग आन्दोलन जोरों पर था। गांधी जी की दांडी यात्रा अंग्रेज सरकार के सामने चुनौती बन गई थी, इसी दौर में बुंदेलखंड में भी आन्दोलन की चिंगारी ज्वाला का रूप लेती जा रही थी। लोग आजादी की लड़ाई के लिए एकजुट हो रहे थे।

आजादी के लिए जारी आंदोलन के दौरान अक्टूबर 1930 को छतरपुर जिले के चरण पादुका नामक कस्बे में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया, इसमें कई हजार लोगों ने भाग लिया। यह इस क्षेत्र में आंदोलन की जलती ज्वाला का संदेश देने वाला रहा। इस दौरान आन्दोलनकारी नेताओं ने हर किसी से स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने तथा लगान का भुगतान न करने की अपील की। इस अपील का असर भी हुआ।

आंदेालनों के साथ आम लोगों की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ती गई। लोगों में अंग्रेज प्रशासन के खिलाफ नाराजगी भी लगातार बढ़ रही थी। यह नाराजगी छतरपुर जिले के महाराजपुर में हुई सभा के दौरान नजर भी आई।

इस सभा की निगरानी के लिए खुद जिला मजिस्ट्रेट उपस्थित था, किन्तु उसकी मौजूदगी का जनता पर उल्टा असर हुआ और आक्रोशित भीड़ ने मजिस्ट्रेट की कार पर पथराव कर दिया। आंदोलनकारियों का गुस्सा सातवें आसमान पर था लेकिन वह अधिकारी जनता के बीच से किसी तरह अपने को सुरक्षित निकाल ले जाने में सफल रहा। इस घटना के बाद अनेक लोगों पर मुकदमा चलाया गया, कई लोगों पर जुर्माना लगाया गया, कईयों को सजाएं हुईं।

इसी क्रम में 14 जनवरी 1931 चरण पादुका में लोगों का जमावड़ा हुआ और 21 सैनानियांे ने अपनी जान की आहूति दी। इस स्थल को अब तक वह पहचान नहीं मिल पाई है जिसकी वह हकदार है। इस साल देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, मगर आजादी की लड़ाई में बुंदेलखंड के जलियांवाला बाग के नाम से पहचाने जाने वाले चरण पादुका स्थल पर एक स्मारक तक नहीं बन पाया है। एक स्तंभ है, जिस पर मशाल नजर आती है, बस यही है यहां की पहचान। वादे कई बार हुए, मगर बात वादों से आगे नहीं निकल पाई।

--आईएएनएस

एसएनपी/एसकेपी