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क्या अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी वाकई गैरकानूनी है

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लेख

रिपब्लिक इण्डिया चैनल के मुख्य संपादक अर्नब गोस्वामी की एक अपराधी के समान की गई गैरकानूनी गिरफ्तारी लोकतंत्र के इतिहास में बेहद अफसोस जनक है। वास्तव में यह शासन के चौथे स्तंभ अर्थात् मीडिया को ध्वस्त करने की कार्यवाही है जिसका लक्ष्य मीडिया की स्वतंत्रता, निडरता एवं निष्पक्षता को हमेशा-हमेशा के लिए कुचल देना है। परंतु ऐसा होता नहीं है क्योंकि सत्य में बड़ी ताकत होती है और सच्चाई खुद ब खुद सामने आ जाती है चाहे उसे छुपाने की कितनी भी कोशिश क्यों न की जाये। इतिहास गवाह है कि 1975 में देश की पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इन्दिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगा कर अपने विरोधियों का दमन करते हुए उन सबको जेल में ठूंसने का निर्णय उन्हें कितना भारी पड़ा था।

जिस केस के अंतर्गत गोस्वामी के खिलाफ कार्यवाही की गई है वह दो वर्ष पूर्व का मामला है जिसमें पर्याप्त गवाही के अभाव में पुलिस अंतिम रिपोर्ट लगा चुकी है। यदि वह फिर से खोला गया या खुलवाया गया है तो उसमें नियमानुसार कार्यवाही की जानी चाहिए थी अर्थात् कोर्ट का आदेश प्राप्त किये बिना सीधे पुलिस द्वारा गोस्वामी को पकड़वाने की क्या जरूरत थी। क्या अर्नब देश छोड़ कर भागे जा रहे थे? साफ दिखाई दे रहा है कि यहां तो सारा मामला एक साहसी एवं सत्यान्वेशी पत्रकार की बेइज्ज्ती करना और उसके मुँह को हर कीमत पर बन्द करवाना है जिससे जनता जनार्दन इन सभी प्रकार से भ्रष्ट तथा अपराधी नेताओं और उनके सहयोगी पुलिस तथा माफियाओं के कुकृत्यों तथा अपराधों को जान न सके।

वास्तव में अर्नब गोस्वामी पिछले कुछ महीनों से कुछ बड़े ही संदेहास्पद और विवादास्पद मामले यथा पालघर में साधुओं की हत्या, सुशांत सिंह की मृत्यु का रहस्य, दिशा सालियान की संदेहास्पद मौत, हाथरस कांड तथा शाहीन बाग प्रदर्शन आदि के बारे में नये-नये तथ्यों को जुटा कर अपने चैनल पर दिखा रहे थे जिससे संभवतः इन मामलों से जुड़े लोग निश्चित ही परेशान रहे होंगे। शायद इसी वजह से पुलिस ने उनसे पहले भी पूछताछ की थी और टीआरपी केस में उनका नाम गलत तरीके से उछाला भी गया था।

आज यह सभी जानते हैं कि नेताओं, धनी माफियाओं तथा पुलिस का गठजोड़ हमारे देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है तथा लोकतंत्र के लिए एक अत्यंत गंभीर संकट है। सही मायने में इस अनैतिक गठजोड़ को स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं निर्भीक पत्रकारिता द्वारा ही तोड़ा जा सकता है। वास्तव में गोस्वामी इसी उद्देश्य से कार्य कर रहे थे। वस्तुतः अपने विचारों को सबके सामने रखना सभी भारतवासियों का मूल अधिकार है तथा यह भारतीय संविधान के अनु0 19(1) ए द्वारा कुछ अपवादों के साथ सुरक्षित किया गया है। अतः गोस्वामी द्वारा अपने विचारों को निर्भीक रूप में प्रकट करना उनका संवैधानिक अधिकार है और इसके लिए उनके खिलाफ बदले की कार्यवाही करना सरासर गलत है।

निःसंदेह एक स्वस्थ्य एवं जीवंत लोकतंत्र के लिए आज यह अत्यंत संकट की घड़ी है जब शासक वर्ग अपनी मर्यादा ही भूल जाए और समान्य जनता, जिनके वोटों की बैसाखी पर वह शासन कर रहा है, उनके मूल अधिकारों का अपने निजी स्वार्थों के लिए हनन करना शुरू कर दे। सत्ताधारियों का यह अहंकार हमेशा उनके विनाश का कारण बना है और ऐसा हर युग में हुआ है। रावण का उदाहरण आज हर किसी की जुबान पर है। जैसे तानाशाही फिर से लौट आयी है और मुम्बई में आपातकाल लगा दिया गया है। निःसंदेह इससे बड़ा शक्ति का दुरूपयोग और क्या हो सकता है।

अतः देश के सभी प्रबुद्ध लोगों को इस घोर तानाशाही के खिलाफ पुरजोर आवाज उठानी चाहिए तथा संवैधानिक सीमा में रहते हुए जनआंदोलन भी करना चाहिए जिससे शासन की मनमानी पर अंकुश लगे और लोकतंत्र की रक्षा हो सके। साथ ही गोस्वामी के साथ हुई पुलिस ज्यादती के लिए दोषी पुलिस वालों तथा उनका इस्तेमाल करने वाले राजनीतिक आकाओं के विरूद्ध भी कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए। पुनः यदि न्यायपालिका इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुये कोई प्रभावी कदम उठाती है तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए अत्यंत शुभ होगा। ऐसा हो सकता है क्योंकि मानव उद्यम से परे कुछ नहीं होता है।

न्‍यूज टुडे नेटवर्क

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